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मन पाए विश्राम जहाँ

जिन्दगी हर पल बुलाती किस कदर भटके हुए से राह भूले चल रहे हम, होश खोया बेखुदी में लुगदियों से गल रहे हम ! रौशनी थी, था उजाला पर अंधेरों में भटकते, जिन्दगी हर पल बुलाती अनसुनी हर बार करते ! चाहतों के जाल में ही घिरा सा मन बुने सपना, पा लिये जो पल सुकूं के नहीं जाना मोल ...
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Tag :उजाला
  October 13, 2017, 2:31 pm
लीला एक अनोखी चलती  सारा कच्चा माल पड़ा है वहाँ अस्तित्त्व के गर्भ में.... जो जैसा चाहे निर्माण करे निज जीवन का ! महाभारत का युद्ध पहले ही लड़ा जा चुका है अब हमारी बारी है... वहाँ सब कुछ है ! थमा दिये जाते हैं जैसे खिलाडियों को उपकरण खेल से पूर्व अब अच्छा या बुरा खेल...
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Tag :कामना
  October 9, 2017, 2:46 pm
एक पुहुप सा खिला है कौन  एक निहार बूँद सी पल भर किसने देह धरी, एक लहर सागर में लेकर किसका नाम चढ़ी ! बिखरी बूँद लहर डूब गयी  पल भर दर्श दिखा,   जैसे घने बादलों में इक चपला दीप जला ! एक पुहुप सा खिला है कौन  जो चुपचाप झरे,   एक कूक कोकिल की गूँजे इक निश्वास भरे ! एक राज ...
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Tag :निहार
  September 25, 2017, 3:24 pm
अब नया-नया सा हर पल है अब तू भी याद नहीं आता अब मस्ती को ही ओढ़ा है, अब सहज उड़ान भरेगा मन जब से हमने भय छोड़ा है ! वह भीति बनी थी चाहों से कुछ दर्दों से, कुछ आहों से, अब नया-नया सा हर पल है अब रस्तों को ही मोड़ा है ! हर क्षण मरना ही जीवन है गिन ली दिल की हर धड़कन है, पल में ही पाया ह...
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Tag :अलस
  September 22, 2017, 10:23 am
एक कलश मस्ती का जैसे बरस रहा सावन मधु बन कर या मदिर चाँदनी मृगांक की, एक कलश मस्ती का जैसे भर सुवास किसी मृदु छंद की ! जीवन बँटता ही जाता है अमृत का एक स्रोत बह रहा, लहराता सागर ज्यों नाचे अंतर में नव राग उमगता ! टूट गयी जब नींद हृदय की गाठें खुल-खुल कर बिखरी हैं, एक अजा...
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Tag :जीवन
  September 18, 2017, 3:05 pm
हिंदी दिवस पर उन अनगिनत साहित्यकारों को विनम्र नमन के साथ समर्पित जिनके साहित्य को पढ़कर ही भीतर सृजन की अल्प क्षमता को प्रश्रय मिला है. जिनके शब्दों का रोपन वर्षों पहले मन की जमीन पर हुआ और आज अंकुरित होकर वाक्यों और पदों के रूप में प्रकटा है. स्मृतियों का एक घना अर...
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Tag :भाषा
  September 14, 2017, 5:25 pm
जाने कब वह घड़ी मिलेगी    तुमको ही तुमसे मिलना है  खुला हुआ अविरल मन उपवन,  जब जी चाहे चरण धरो तुम सदा गूंजती मृदु धुन अर्चन !  न अधैर्य से कंपतीं श्वासें  शुभ्र गगन से छाओ भीतर,  दिनकर स्वर्ण रश्मि बन छूओ कुसुमों की या खुशबू बनकर !  कभी न तुमको बिसराया है  जगते-सोते या...
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Tag :गगन
  September 13, 2017, 3:12 pm
एक अजब सा खेल चल रहा इक ही धुन बजती धड़कन में इक ही राग बसा कण-कण में, एक ही मंजिल,  रस्ता एक इक ही प्यास शेष जीवन में ! मधुरम धुन वह निज हस्ती की एक रागिनी है मस्ती की, एक पुकार सुनाई देती दूर पर्वतों की बस्ती की ! मस्त हुआ जाये ज्यों नदिया पंछी जैसे उड़ते गाते, डोलें ...
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Tag :धुन
  September 8, 2017, 11:31 am
गीत अंतर में छिपा है शब्द कुछ सोये हुए से भाव कुछ-कुछ हैं अजाने, गीत अंतर में छिपा है सृजन की कुछ बात कर लें ! बीज भीतर चेतना का फूल बनने को तरसता, बूंद कोई कैद भीतर मेघ बन चाहे बरसना ! आज दिल से कुछ रचें हम मन नहीं यूँ व्यर्थ भटके, तृषा आतुर तृप्त होगी ललक जब अंतर से प्...
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Tag :दिल
  August 30, 2017, 10:35 am
किसका रस्ता अब जोहे मन तू गाता है स्वर भी तेरे लिखवाता नित गान अनूठे, तू ही गति है जड़ काया में सहज प्रेरणा, उर में पैठे ! किसका रस्ता अब जोहे मन पाहुन घर में ही रहता है, हर अभाव को पूर गया जो निर्झर उर में वह बहता है ! तू पूर्ण हमें पूर्ण कर रहा नहीं अज्ञता तुझको भाती, हर...
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Tag :ज्योतिर्मय
  August 27, 2017, 10:28 am
अमृत बन कर वह ढलता है उससे परिचय होना भर है कदम-कदम पर वह मिलता है, उर का मंथन कर जो पाले परम प्रेम से मन खिलता है ! भीतर के उजियाले में ही सत्य सनातन झलक दिखाता, कण-कण में फिर वही छिपा सा  साँस-साँस  में भीतर आता ! पहले आँसू जगत हेतु थे अब उस पर अर्पित होते हैं अंतर भ...
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Tag :ज्योति
  August 23, 2017, 3:03 pm
स्वप्न देखे जगत सारा  झिलमिलाते से सितारे झील के जल में निहारें, रात की निस्तब्धता में उर उसी पी को पुकारे ! अचल जल में कीट कोई कोलाहल मचा गया है, झूमती सी डाल ऊपर खग कोई हिला गया है ! दूर कोई दीप जलता राह देखे जो पथिक की, कूक जाती पक्षिणी फिर नींद खुलती बस क्षणिक सी ...
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Tag :दीप
  August 18, 2017, 4:09 pm
फूल ढूँढने निकला खुशबू पानी मथे जाता संसार बाहर ढूँढ रहा है प्यार, फूल ढूँढने निकला खुशबू मानव ढूँढे जग में सार ! लगे यहाँ  राजा भी भिक्षुक नेता मत के पीछे चलता, सबने गाड़े अपने खेमे बंदर बाँट खेल है चलता ! सही गलत का भेद खो रहा लक्ष्मण रेखा मिटी कभी की. मूल्यों की फ़िक...
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Tag :प्यार
  August 16, 2017, 5:55 pm
कान्हा तेरे नाम हजारों जब नभ पर बादल छाये हों वन से लौट रही गाएँ हों, दूर कहीं वंशी बजती हो  पग में पायलिया सजती हो ! मोर नाचते कुंजों में हों खिले कदम्ब निकुंजों में हों, वह चितचोर हमारे उर को, कहीं चुराए ले जाता है ! कान्हा याद बहुत आता है ! भादों की जब झड़ी लगी थी अं...
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Tag :कृष्णा
  August 14, 2017, 3:01 pm
तिर जाओ पात से सुनो ! तारे गाते हैं फूलों के झुरमुट.. प्रीत गीत गुनगुनाते हैं पल भर को निकट जाओ वृक्षों के कानों में कैसी, धुन भर जाते हैं ! देखो ! गगन तकता है बदलियों का झुंड झूम-झूम कर बरसता है ठिठको जरा सा.. बैठो, हरी घास पर पा परस दिल.. कैसे धड़कता है ! बहो ! कलकल बहती है न...
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Tag :उषा
  August 11, 2017, 3:15 pm
श्रावण की पूनम गगन पर छाए मेघ लगे हरियाली के अंबार बेला और मोगरे की सुगंध से सुवासित हुई हवा आया राखी का त्योहार गाने लगी फिजां ! भाई-बहन के अजस्र निर्मल नेह का अजर स्रोत सावन की जल धाराओं में ही तो नहीं छुपा है ! श्रावण की पूनम के आते ही याद आते हैं रंग-बिरंगे धागे क...
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Tag :गंगा
  August 5, 2017, 10:31 am
हर पगडंडी वहीं जा रही कोई उत्तर दिशा चल रहे दक्षिण दिशा किन्हीं को प्यारी, मंजिल पर मिलना ही होगा हर पगडंडी वहीं जा रही ! भर नयनों में प्रेमिल आँसू जब वे गीत विरह के गाते, बाना ओढ़े समाधान का तत्क्षण दूजे भी जुड़ जाते ! ‘तेरे’ सिवा न कोई दूजा कह कुछ मस्तक नहीं उठाते, ...
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Tag :दक्षिण
  August 3, 2017, 2:02 pm
थम जाता सुन मधुर रागिनी कोमल उर की कोंपल भीतर खिलने को आतुर है प्रतिपल, जब तक खुद को नहीं लुटाया दूर नजर आती है मंजिल ! मनवा पल-पल इत-उत डोले ठहरा आहट पाकर जिसकी, जैसे हिरण कुलाँचे भरता थम जाता सुन मधुर रागिनी ! जिसके आते ही उर प्रांगण देव वाटिका सा खिल जाता, हौले-हौले...
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Tag :प्रेमिल
  July 28, 2017, 3:33 pm
कविता हुंकारना चाहती है छिपी है अंतर के गह्वर में या उड़ रही है नील अंतरिक्ष की ऊँचाईयों में घूमती बियाबान मरुथलों में या डुबकी लगाती है सागर की गहराइयों में तिरती गंगा की शांत धारा संग कभी डोलती बन कावेरी की ऊंची तरंग खोज रही है अपना ठिकाना झांकती नेत्रों में... न...
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Tag :अमन
  July 24, 2017, 3:59 pm
उन अँधेरों से डरें क्यों खो गया है घर में कोई चलो उसे ढूँढ़ते हैं बह रही जो मन की सरिता बांध कोई बाँधते हैं आँधियों की ऊर्जा को पाल में कैसे समेटें  उन हवाओं से ही जाकर राज इसका पूछते हैं इक दिया, कुछ तेल, बाती जब तलक ये पास अपने उन अँधेरों से डरें क्यों खुद जो रस्ता ख...
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Tag :तेल
  July 15, 2017, 10:54 am
गाना होगा अनगाया गीत गंध भी प्रतीक्षा करती है उन नासापुटों की, जो उसे सराहें प्रसाद भी प्रतीक्षा करता है उन हाथों की, जो उसे स्वीकार लें जो मिला उसे बांटना होगा होने को आये जो हो जाना होगा गाना होगा अनगाया गीत लुटाना होगा वह कोष भीतर छुपा    पलकों में बंद ख्वाबों ...
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Tag :ख्वाब
  July 12, 2017, 3:45 pm
मानव और परमात्मा मुक्ति की तलाश करे अथवा ऐश्वर्यों की परमात्मा होना चाहता है मानव या कहें ‘व्यष्टि’ बनना चाहता है ‘समष्टि’ प्रभुता की आकांक्षा छिपी है भीतर पर कृपण है उसका स्नेह जो प्रेम में नहीं बदलता बदल भी गया तो धुंधला-धुंधला है   पावन है यदि प्रेम तो धुआं न...
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Tag :प्रेम
  July 10, 2017, 3:57 pm
गुरू पूर्णिमा के अवसर पर युगों-युगों से राह दिखाते उर-अंतर का तमस मिटाते, ज्योति शिखा सम सदा प्रज्ज्वलित सीमाओं में नहीं समाते ! प्रेम, ज्ञान, सुख पुंज शांति के सुमन खिलाते परा भक्ति के बिना भेद दिल से अपनाया बंधन तोड़कर आसक्ति के ! विश्व बना परिवार तुम्हारा सदा ...
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Tag :जीवन
  July 9, 2017, 11:00 am
जादूगर और माया चला आता उसी तरह दुःख पीछे सुख के जैसे आदमी के पीछे उसकी छाया भर दामन में ख़ुशी बाँटने निकले कोई तो बदल देती है गमों में उसको माया भरें हर्जाना यदि चाहा सुख कण भर भी चुकायें कीमत हर आसक्ति हर मोह की कुछ भी यहाँ मुफ्त नहीं मिलता बिना एक हुए माटी से कोई बी...
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Tag :दुःख
  July 8, 2017, 2:36 pm
यहाँ दो नहीं हैं हर बार जब मैंने तुम्हें चाहा है खुद को ही पसंद किया है हर बार जब तुम्हारी किसी बात को सराहा है अपनी पीठ थपथपाई है हर कोई खुद से प्यार करे तो कितनी हसीन हो जाये यह दुनिया हर बार जब मैं तुम से दूर हुई खुद से ही दूर हुई हूँ हर शिकायत जो मैंने तुमसे की है ...
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Tag :घाव
  July 7, 2017, 1:37 pm
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