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हमसफ़र शब्द

सालो तक एक नज़्म के साये में पनाह ले रखी थी नींद बड़ी ही मिठ्ठी थी थपकियां उसकी सपनों के दरवाजे खोलती थी एक दिन दरिया ने काट दिया पूरा का पुरा जमीन नज़्म दफ़न हो गयी थी इंच इंच मौत के बीच  दलदल में धंसती हुई कई ज्वालामुखियों के बीचछूटी हुई कोई रात थी  ख़ाक हो गयी थी गहर...
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  May 3, 2016, 5:44 pm
जानाकिसीलौटनेसेकमनाहोपरइसवक्तमेसडकेभीगुत्थियोंसेहोकरजातीहैं  औरगुत्थियांकंदराओमेठहराहुआ,घुपअंधेराहैंरौशनी, सूरजकेजितनादूरऔरठहराहुआकदमभीघरसेदूरफ़िरभीहमलौटनाचाहे, तोघरकाशबचपनवालाघरलौटताजहांसबकुछसुन्दरहीहोताथासच सुन्दरताकोबचानाकितनामुश्कि...
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  February 29, 2016, 6:05 pm
जानाकिसीलौटनेसेकमनाहोपरइसवक्तमेसडकेभीगुत्थियोंसेहोकरजातीहैं  औरगुत्थियांकंदराओमेठहराहुआ,घुपअंधेराहैंरौशनी, सूरजकेजितनादूरऔरठहराहुआकदमभीघरसेदूरफ़िरभीहमलौटनाचाहे, तोघरकाशबचपनवालाघरलौटताजहांसबकुछसुन्दरहीहोताथासच सुन्दरताकोबचानाकितनामुश्कि...
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  February 29, 2016, 6:05 pm
हमारे मसीहा हमे भूलाते गये और हम मानो किसी नदी से बाहर आते गये ठहर गई जिन्दगी वहांजहां मरुस्थल सी ताप थी सडक किसी विराने मे अकेले कही किसी ओर चलती गई बची हुई मुठ्ठी भर सपनीले रातों को अब दरिया के किनारे रखूं या सूरज के सामने हकीकत यह रहा कि रौशनी और अन्धेरे के बीच उलझती ग...
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  February 2, 2016, 5:38 pm
दांत तले जुबान ना दबती असल मे एहसास खुबसूरत होते तो वे कभी ना मुरझाते, साहबना यहां कोई जमीर बिकता और ना ही अन्धेरे मे कोई नाच होती हकिकत तो यह है कि यहां रोज पिटारे से रंग-बिरंगे फ़नोवाले सांप निकलते है इनकी जुगलबंदी से धरती छलनी होती है और आसमान तोले जाते है हवा मे विष...
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  January 12, 2016, 5:46 pm
दांत तले जुबान ना दबती असल मे एहसास खुबसूरत होते तो वे कभी ना मुरझाते, साहबना यहां कोई जमीर बिकता और ना ही अन्धेरे मे कोई नाच होती हकिकत तो यह है कि यहां रोज पिटारे से रंग-बिरंगे फ़नोवाले सांप निकलते है इनकी जुगलबंदी से धरती छलनी होती है और आसमान तोले जाते है हवा मे विष...
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  January 12, 2016, 5:46 pm
आरजूओं कोरात में ढल जाने दोसुबह की इन्तजार मेंताकिकुछ शब्द जलते रहेऔर कुछ शब्द बाकी रहे !चमन हो औरख्वाब भी हकीकत होयह मुमकीन नहीरात की विरानगी मेंजुगनूओ का डेरा रहेताकिचांद कुछ बाकी रहे !ऐसी उम्मीद किलाठी मिलेमुफ़लिसी कोताकिउनकी आंख खुलती रहेऔर सरकार की सल्तनत में...
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  July 11, 2015, 4:52 pm
भीड़ बहुत है सबने अपना अपना सामान बाँध लिये हैं और जो छूट रहें है उनका पता कही खो जायेगा गुमराह राहों के बीच बहुत दूर जाना है कही दूर मंजिल भी है पर रास्तों का कही कोई अपना ठिकाना भी तो नहीं है वजह कुछ ऐसी है कि सघन हताशा और निराशा के बीच सबको सफ़र करना हैघर के अन्दर कई दीवार...
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  June 12, 2015, 5:42 pm
भीड़ बहुत है सबने अपना अपना सामान बाँध लिया हैं और जो छूट रहें है उनका पता कही खो जायेगा गुमराह राहों के बीच बहुत दूर जाना है कही दूर मंजिल भी है पर रास्तों का कही कोई अपना ठिकाना भी तो नहीं है वजह कुछ ऐसी है कि सघन हताशा और निराशा के बीच सबको सफ़र करना हैघर के अन्दर कई दीव...
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  June 12, 2015, 5:42 pm
त्रिकोण है कोईधटनाओ के अंतराल के बीच एक कोने का ओरछोर मिले और दूसरे कोने को समझ पाते इससे पहले तीसरे कोने पर कोई दर्द टंगा मिलता मजबूरी यह थी कि एक कोने से दूसरे कोने तक हम सीधे सीधे ही जा सकते थे चलने की चाल चाहे जो भी अख्तियार करते पर सीधे सीधे चलकर हीदूसरे कोने तक पह...
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  May 17, 2015, 9:14 pm
बारिश नहीं बरसेगी रातें नहीं तरसेंगी  नींद अपने स्वपन में उतरेगी उम्मीद किसी डाल की चिड़ियाँ नहीं जो फुर्र से उड़ जाए एक पल या दो पल बैठकर रोकना है तो रोक लो अनंत असंख्य जघन्य नुकीले कीलों को गड़ने से दीवारों में कैद साँसें अब बगावती है टूट जायेंगी दीवारे एक अदद खिड़की के ...
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  February 9, 2015, 7:46 pm
१.मन सा आकाशउड़ान परिंदों की उदाससघन तारों के बीच चाँद फिर भी तन्हाएकांकी से भरा  असंख्य प्रकाश वर्ष की दूरी परजिन्दगी पानी पर बहती जाती !२.छाया कही नहीं पृथ्वी पर रोज पत्तों के टूटने से आँखें धुंधली और बच्चो की दुनिया के सपने सूखती बस्तों के बोझ तले  उसपर मौस...
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  December 28, 2014, 9:39 pm
किताबों में बेहिसाब आडी-तिरछी लकीरें है जवाब अक्षरों के हिस्से में नहीं आती है सुना है कलम को उकेरता कोई कलाकार है साफ़ सफ़ेद किताबों को पलटता कोई तो है किताबें जगह भी छेकतीं है और स्याही पन्नों पर फैलती जाती है सवाल शब्दों के एक ठीगने से व्यक्ति के चेहरे पर उगता है बिना ...
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  November 4, 2014, 7:15 pm
समंदर की गहराई मापते या पहाड़ चढ़ते  ऊबड़ खाबड़ जमीन पर श्वेत-श्याम के बीच जूझती जिंदगी को सफर की बोझिलता से बचा लेना चाहते थे चेहरे पहचाने से थे और रास्ते उलझे हुये धागे थे नेक आँखें नमकीन ज्यादा और रौशन कम थी क्यों मजबूर थी साँसेंआखिर कौन सा मंतर था  जहां हम ऊंचाई और गह...
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  September 10, 2014, 9:08 pm
हर देश की अपनी मिट्टी है और हर मिट्टी की अपनी कहानी है मिट्टी के कणों मे कही गाँव है तो कही शहर पगडंडियो के गुम होने से कही गाँव तन्हा और अकेला है तो शहर अपने आप में गुम हो जाने से, खौफजदा पर कही ना कही दर्द तो अपनी मिट्टी की ही है ना हम लाख चमकीले और भड़कीले हो जाये पर देश अपन...
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  August 25, 2014, 9:10 pm
आँगन में तुलसी मुरझाई हुई थी पदचिन्हों के पीछे कही कोई आवाज शेष नही थी और दहलीज से पार कही कोई महफूज शाखें नही बची थी घटना कुछ ऐसी थी किख्वाब से बाहर आते ही चादर पर सिलवटों का दिखना और पृष्टभूमि से आती हुई बिना सुरताल की आवाज का कानों से टकराने जैसा था  कही कोई सपाट और स...
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  July 25, 2014, 7:56 pm
सच स्याह रात थी सुबह ना था उम्मीद शीतलता की रौशनी के बीच कटने लगी थी जमीन तो था पर नमी ना था जहां नदी थी वहां रुदन बची थी रोज सबेरे उदास सूरज चमड़े के बीच जलता थाआवाजें ऐसी थी किस्पर्श अनाथ थी गहन अंधेरे में मोमबत्तियाँ जलती थी !  ...
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  June 27, 2014, 1:33 pm
नही मिलती है अब   वर्तमान के हस्ताक्षर में जो खो गई थीआँगन से दहलीज के बीच  पड़ी है कही वो उल्लूओ की आवाज सेहोती और डरावनीस्याह रातों के बीच   वक्त के टिक टिक परनाचती रूह में, उसके कई मौसम उदास बैठे है  जिस्म की कफ़स में कई युग बीते   तूमने रौशनी बना डाली जिस्म ...
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  May 1, 2014, 12:49 pm
चाहिये जो, दरवाजे नही खुलते  कैसे पा लेंगे उसे जो सड़क के बीचों बीच किसी सुरंग मे खो गया है आवाजें भरी पड़ी है  गहन सन्नाटो के बीचऔर वहाँ दर्द से बाहर नही है डोर पर टिकी सांसें ना जाने कब छूट जाये खो जायेँगे हम बिना चेहरा और बिना जिस्म रोशनी की तलाश होगी और  उम्मीद जिंदा...
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  February 27, 2014, 4:08 pm
चाहिये जो, दरवाजे नही खुलते  कैसे पा लेंगे उसे जो सड़क के बीचों बीच किसी सुरंग मे खो गया है आवाजें भरी पड़ी है  गहन सन्नाटो के बीचऔर वहाँ दर्द से बाहर नही है डोर पर टिकी सांसें ना जाने कब छूट जाये खो जायेँगे हम बिना चेहरा और बिना जिस्म रोशनी की तलाश होगी और  उम्मीद जिंदा...
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  February 27, 2014, 4:08 pm
उन दरवाजो को तोड़ना संभव ना था  जो उदार और शालीन दिखने वाले लोगों के बीच खुलती थीऊंचाई,ताकत, दंभ और ना जाने कितनी बारीक तहें थी जहां चिंट्टियां रौंद दी जाती थी ऐसे समंदर का क्या जहां बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों को बेखौफ खाती थीं  और उँगलियों पर लहरों को गिनना एक आदत बन चु...
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  February 10, 2014, 9:41 pm
कई लोग एक चित्र को एक तरफ से देख रहे थे औरकई लोग दूसरी तरफ से कुछ ऐसे भी लोग थे जो एक चित्र को कई कोनो से देख सकते थे शीशे मे कैद अक्स अकसर हमारे वजूद को हिला देता था  समाज अंधेरे मे रखा तरल पदार्थ है जिसका कोई अपना ठोस आकार नही हैसिर्फ और सिर्फ नजरो का धोखा हैवर्चस्व के ...
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  December 18, 2013, 9:59 pm
बदलते चांद को और  किनारों पर लहरों को ठोकर खाते देखाआंखो का समंदर नमकीन ठहराअक्सर  पलको पर उमड़ते देखा बादल बादल आसमान देखा पर कही जमीन हरी तो कही बंजर देखा सुना है वे खींच लाते है बारिशें पर रहनुमाओ की पनाह में उन्हें खाली हाथ देखा वे जमीन तोड़ते है और आसमान बाँटते है ...
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  November 13, 2013, 8:57 pm
चिराग जलाये रखा मद्धम आंच पर भूख पकते रहे उम्मीद में वक्त बेरहम निकलापत्थर तोड़ते वक्त उम्मीद टाँकते रहे मासूम हथेलियो पर कई कई छाले निकले  रिसते जख्म के चेहरे डरावने निकले  वक्त कोई भी हो साहब जख्म तो हरहाल में जख्म निकलाना उम्मीद जन्मी और ना इंकलाब निकलामुफ़लिसी म...
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  November 6, 2013, 5:10 pm
परंपरा कुछ ऐसी थी किपत्थर के अंदर सबसे खूबसूरत और शक्तिशाली फूल तलाशते थे हम  हमें सबकुछ पता थाकि मृग मरीचिका के भयावह दुष्चक्र मेँकही कोई पानी नही है पर प्यास के लिए कही दूसरा विकल्प भी नही था और डूब जाना हमारा एक मात्र चयन बिखराव से भरी रंगो की कैनवास पर अनेक रंग का ...
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  October 28, 2013, 9:03 pm
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