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मेरे अनुभव (Mere Anubhav)

जीवन में न जाने कितने अनुभव होते हैं ना,छोटे बड़े,अच्छे बुरे यहाँ तक कि हर पल एक अनुभव देकर जाता है भले ही वह क्षणिक ही क्यूँ न हो। ऐसे ही कुछ अनुभव मुझे भी हुए जब मैंने पुणे से दिवेआगर तक का सफर कार से तय किया। कार का नाम इसलिए लिया क्यूंकि जब आप अपनी कार से किसी यात्रा पर नि...
मेरे अनुभव (Mere Anubhav)...
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  March 29, 2017, 9:35 pm
  आज के इस दौर में तकनीक के बिना जीवन सोचने में भी ऐसा लगता है मानो यह कोई असंभव सी बात हो,दिन प्रतिदिन हम तकनीक पर कितने निर्भर हो गए हैं कि उसका उपयोग करना हमारे लिए सांस लेने जितना ज़रूरी हो गया है। गैरों की तो मैं क्या बात करूँ, मेरा ही जीवन बिना किसी तकनीकी साधन के नह...
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  March 22, 2017, 4:50 pm
दो साल हो गये मुझे पुणे आये मगर अभी तक यहाँ कि (नाईट लाइफ) के विषय में मुझे कोई जानकारी नहीं थी। विदेशों में तो नाईट लाइफ का चलन बहुत सुना और देखा था। हालांकि मुंबई के विषय में आम लोगों की यही राय है कि यह शहर दिन में सोता और रात में जागता है। खैर मैं बात कर रही हूँ पुणे की, हा...
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  March 1, 2017, 11:24 pm
बदलते समय के साथ बदलना शायद सब के बस की बात नहीं और मैं उन्हीं में से एक हूँ|आप लोगों को जानकर शायद आश्चर्य हो,लेकिन यह सच है मैंने अपने जीवन में आज से पहले कभी (पब) का चेहरा भी नहीं देखा था |एक तरह से देखा जाए तो पांच साल नई दिल्ली में रहने के बाद और आठ साल लन्दन में रहने के बा...
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  December 15, 2016, 11:56 pm
आज बहुत दिनो बाद कुछ लिखने का मन हो रहा है। न जाने क्यूँ पिछले कुछ महीनों से लिखने से मन उचट गया था। व्यतीत होते समय के साथ ऐसा लगता है मानो सब कुछ कितना तेजी से बदल रहा है। औरों के बारे में सोचो, तो लगता है मानो समय ने पंख लगा लिए हों। कई बार अपने गुजरते अच्छे समय के साथ भी ऐ...
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  September 20, 2016, 4:55 pm
वर्तमान हालातों को देखते हुए लगता है कि आज ज़िंदगी मौत से सस्ती हो गयी है। जान देना मानो बच्चों का खेल हो गया है। ज़रा कुछ हुआ नहीं कि लोग जान ऐसे देते है मानों कुछ हुआ ही नहीं।  देखो न प्रत्यूषा प्रत्यूषा प्रत्यूषा, आज चारों और बस एक ही नाम है। मेरे विचार में तो वह इतन...
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  April 17, 2016, 9:07 am
आज की तारीख में 'विश्वास', जैसे किसी दुरलभ चिड़िया का नाम हो गया है। जो अब कभी-कभी या कहीं- कहीं ही देखने को मिलती है। हर देखी सुनी बात पर भी विश्वास करने में संदेह होता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हम जो देख रहे हैं जो पढ़ रहे है उसके पीछे का सच कुछ और ही हो। दिल तो कहता है कि विश्वा...
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  April 6, 2016, 10:45 am
“~डर के आगे ही जीत है~”आज फिर एक विज्ञापन देखा जिसमें हवा को स्वछ बनाने वाले यंत्र का उपयोग करने की सलाह दी जा रही थी अर्थात आसान शब्दों में कहूँ तो (एयर प्यूरीफायर) का विज्ञापन देखा। क्या वास्तव में हम इतने भयानक वातावरण में जी रहे हैं कि हमारे घर की हवा तक स्वच्छ नहीं है...
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  March 12, 2016, 3:10 pm
कभी कभी बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते जब अपना बचपन याद आता है तो तब कैसी अच्छी सुखद अनुभूति का एहसास होता है। जिसके विषय में सोचकर ही चेहरे पर स्वतः एक भीनी सी मुस्कान आ जाती है। वैसे तो इन दिनों परीक्षा का माहौल है। जिसके चलते न सिर्फ बच्चे बल्कि हम बड़े भी परेशान हैं । फिर चाहे ...
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  March 5, 2016, 5:01 pm
कहते है परिवर्तन ही जीवन का आधार है। जो समय के साथ बदल जाये वही व्यक्ति सफल कहलाता है। लेकिन मेरी सोच और समझ यह कहती है कि “परिस्थिति के आधार पर समग्ररूप से मानवता का जो कल्याण करने में सक्षम हो या फिर जिसमें मानवता के कल्याण की भावना निहित हो,सही मायने में वही सच्चा बदल...
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  January 28, 2016, 9:07 pm
भारत वापस आने के बाद यह मेरी दूसरी दीपावली थी। जिसने मुझे अनगिनत अनुभव की पोटली दे डाली। पिछले साल दिवाली यही मेरे घर पुणे में मनाई थी और इस साल दिवाली मनाने हम जबलपुर गए, वह भी कार से, यह शुरुआत थी उन अनुभवों की जो आज तक के जीवन में मुझे पहले कभी न हुए थे। ऐसा इसलिए कहा क्य...
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  December 12, 2015, 9:22 pm
कंक्रीटों के जंगल के बीच एक छोटे से भू भाग में टीन के पतरों से बने कुछ मकान जो उनमें रहने वाले गरीब मजदूर परिवार के लिए घर कहलाते है। घर जिसका सीधा सा अर्थ होता है एक इंसान के लिए सर छिपाने की एक ऐसी जगह जहां आकर उस इंसान को सुकून मिलता है, शांति मिलती है। या फिर यह कहा जाए क...
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  December 1, 2015, 5:31 pm
साधारण लोग सोचते है मृत्यु एक विराम है जिसके आगे सब समाप्त हो जाता है। शेष कुछ भी नहीं रहता सिवाए मिट्टी के पर क्या यही सच है। मेरे अंदर कई प्रश्न उठते है मगर जवाब आजतक नहीं मिला। मृत्यु क्या है एक जीवन का अंत या फिर एक नयी शुरुआत। मृत्यु को लेकर हम यह मानते है कि मरणोपरा...
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  November 19, 2015, 2:46 pm
अपराधी आखिर कौन ? बलात्कार या बलात्कारी जैसा शब्द सुनकर अब अजीब नहीं लगता। क्यूंकि अब तो यह बहुत ही आम बात हो गयी है। कई बार तो एक स्त्री होने के बावजूद भी अब ऐसे विषयों को पढ़ने का या इस विषय पर सोचने का भी मन नहीं करता। कुछ हद तक तो अब अफसोस भी नहीं होता। हालांकी मैं यह ब...
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  October 29, 2015, 1:16 pm
"गुनाहों का देवता"यह नाम तो आप सभी ने देखा सुना और पढ़ा ही होगा। शायद ही कोई ऐसा हो जिसे हिन्दी साहित्य में रुचि हो और उसने यह उपन्यास न पढ़ा हो। क्या कहूँ क्या लिखूँ निःशब्द हूँ मैं इस रचना को पढ़कर। जी हाँ धर्मवीर भारती जी की अपने आप में एक अदबुद्ध अद्वितीय रचना है यह "गुनाह...
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  October 23, 2015, 11:00 am
आखिर ऐसा क्यूँ होता है। आज हर कोई केवल अपनी बात कहना चाहता है किन्तु किसी दूसरे की कोई बात सुनना कोई नहीं चाहता। हर कोई ऐसा एक व्यक्ति चाहता है जो पूरे संयम और धेर्य के साथ आपकी पूरी बात सुने वह भी बिना कोई प्रतिक्रिया दिये। न सिर्फ सुने, बल्कि आपको समझने का भी प्रयास करे...
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  October 15, 2015, 11:56 am
"रिश्तों की डोरी में एक धागा मेरा एक तुम्हारा "यह पंक्ति पढ़कर क्या आपको कुछ याद आया। संभवतः नहीं! क्यूंकि टीवी पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों के बीच घड़ी घड़ी होते मध्यांतर पर ध्यान ही कौन देता है। है ना! लेकिन मैं शायद उनमें से हूँ जो कार्यक्रमों पर कम और विज्ञापनों प...
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  October 8, 2015, 11:29 am
आज के वातावरण में जहां एक ओर प्रतियोगिता का माहौल है। वहाँ क्या रिश्ते और क्या व्यापार अर्थात रिश्तों में भी इतनी औपचारिकता आ गयी है कि कई बार यकीन ही नहीं होता। इस का कारण जागरूकता है या विकास,यह कहना मुश्किल है। क्यूंकि यदि जागरूकता की बात की जाये तो आज की नारी जागरूक...
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  October 4, 2015, 12:27 pm
अब इसे अच्छा तो कोई दूजा नाम हो नहीं सकती था इस पोस्ट का! नहीं? पाँच महीने बाद जब ब्लॉग पर वापसी हो तब शुरुआत तो शुभ होनी ही चाहिए। यूं भी इन दिनों यहाँ गणपती का ज़ोर है। लेकिन पांचवे दिन के बाद अब कई जगहों से विसर्जन हो चला है। जहां तक माहौल की बात है। कई दिन पहले से माहौल खु...
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  September 25, 2015, 12:15 am
प्राय: लोग कहते हैं कि पत्थरों को दर्द नहीं होता, उनमें कोई भावना ही नहीं होती। किन्तु न जाने क्‍यों मुझे उन्हें देखकर भी ऐसा महसूस होता है कि पत्थर सिर्फ नाम से बदनाम है। दुख-दर्द जैसी भावनाएं उनमें भी व्याप्त होती हैं। तभी तो पत्थरों में भी फूल खिल जाते हैं।पानी भी पत...
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  April 25, 2015, 3:37 pm
भारत वापसी के बाद इस बार रामनवमी के शुभ अवसर पर जब मुझे कन्या भोज कराने का सुअवसर प्राप्त हुआ तब सर्वप्रथम मन में यही विचार आया कि कन्याएँ मिलेंगी कहाँ? वैसे तो मेरे पास-पड़ोस में कन्याओं की कोई कमी नहीं है, लेकिन उस दिन सभी के घर भोज के निमंत्रण के चलते पहले ही कन्याओं का ...
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  April 15, 2015, 11:06 pm
लोगों के मन में बसे डर कमजोरियों या फिर उनकी कमियों को निशाना बनाकर धनार्जन करने की कला तो कोई इन विज्ञापन निर्माताओं से सीखे। मुझे तो कई बार ऐसा भी लगता है कि एक सामाजिक राजनैतिक या फिर कोई धार्मिक अथवा पारिवारिक धारावाहिक बनाने या लिखने से कहीं अधिक कठिन होता होगा य...
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  April 8, 2015, 1:51 pm
पिछले कुछ महीनों मैं मुझे ऐसा लगने लगा था कि समाचार पत्रों में केवल राजनीतिक अथवा अपराधिक समाचारों के अतिरिक्त और कोई समाचार आना ही बंद ही हो गए हैं या यह भी हो सकता है कि शायद मैंने ही समाचार पत्र पढ़ने में आज से पहले कभी इतनी रुचि ही न ली हो। इसलिए मुझे पहले कभी यह महसूस ...
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  April 1, 2015, 11:44 am
आजकल मोबाइल की इस एप्प का विज्ञापन टीवी पर बहुत दिखया जा रहा है। आपने भी ज़रूर देखा होगा। जहां इस एप्प ने आपको अपनी मन मर्जी के मुताबिक जब जी चाहे, जहां जी चाहे अपनी पसंद के कार्यक्रम देखने की सहूलियत दी वहीं दूसरी ओर कहीं न कहीं आपको अकेला कर दिया। आगे पढ़ने के लिए कृपया इ...
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  March 25, 2015, 11:54 am
यूं तो सुखद बचपन की कोई परिभाषा नहीं होती। मगर फिर भी जहां निजी जरूरत की पूर्ति के साथ-साथ बड़ों का आशीर्वाद हो, उनका प्यार दुलार डांट डपट सभी कुछ मौजूद हो, जीवन के वो हँसते गाते पल हों जो जीवन शब्द को सार्थक बनाते हैं। वही तो सही मायने में बचपन कहलाता है। आगे पढ़ने के लिए ...
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  January 18, 2015, 11:38 am
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