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पुष्पम

वह भैया है या अंकल उसे नहीं पता, बस वह इतना जानता है कि उसका जन्म दूध बेचने के लिए ही हुआ है। बाप-दादा यही करते रहे, सो उसे भी यही करना है। बाप-दादा भी यह जानते थे कि उसे यही करना है, इसीलिए जब वह सातवीं क्लास में अपने मास्साहब की कलाई काट कर घर भाग आया था, तो वे दोनों जोर से हँस...
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  May 26, 2015, 7:13 am
जी, के. श्रीकुमार का यह चित्र मैंने खींचा है १). छुट्टीहे भगवान !गणित के अध्यापकछुट्टी पर होने चाहिएगणित अध्यापक आएडाँट भी पड़ीभगवान छुट्टी पर थे।२).  सिद्धांतकविता पढ़ीजरा भी समझ में नहीं आयीतब इस सिद्धांत का जन्म हुआ"पढ़ने पर जो समझ न आएवही होती है कविता।"3).  भगत सिंह...
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  October 17, 2014, 9:37 pm
एक विशाल स्टेडियम से उस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण देश भर के टेलीविज़न चैनलों पर जारी था, जिसे मैं सपने में देख रहा था। कार्यक्रम इतना भव्य था कि स्वप्न में भी मैं पलकें नहीं झपका पा रहा था। खचाखच भरे उस स्टेडियम में सुई रखने भर की भी जगह शेष न थी। विविध भाषाओं वाले इस दे...
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  September 14, 2014, 12:44 pm
थप्पड़ कुमारी दिया मिश्रा की डिजिटल पेंटिंग 'सिटी' यह उस समय की बात है जब शहरों में नए-नए कंक्रीट के जंगल उगने शुरू हुए थे। सड़क के किनारे के पेड़ इसलिए काट दिए गए थे कि उनसे कंक्रीट के तीन, पांच, सात मंजिला इमारतों की शोभा बिगड़ती थी। घरों के भीतर के पेड़ इसलिए काटे गए...
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  March 25, 2014, 9:08 am
1. कवितेच्या गर्भातूनवेदनेला अर्थवायाशब्द शब्द गोळा केलाएका एका अक्षरासीतप तप दिस गेलायुगे युगे धुंडाळलीतेव्हा आली एक ओळजरा जरा टिचू लागेदु:ख कल्पांताची खोळओळ ओळ जुळू लागेदेही मनी उठे कळझळ लागे रोमरोमीप्राणातून सळसळवेदनांच्या ओझ्याखालीएका क्षणी निर्वाणलोकवि...
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  September 2, 2013, 4:50 pm

1. From the Embryo of poetryGave meaning to anguishesaccumulated each of the wordfor every alphabeta day became years of duodecimal Ages to seeka line emergesPullulates bit of stratum of deep struck griefline adds to linecorpus nous crop up contrivancepilus n pore showersdelight from soulunder the encumbrance of anguishesin a moment of emancipationfrom the embryo of poetryit is my rebirthEmbryo - wombDuodecimal - term used for twelve.Pullulates -  cracksCorpus - bodyNous - mind2. I'm HumanBe blessed with your godyour fear of frauddoesn't bothers meI shaped your Godand handed himcharges of destinyMy fist containsWarmth, Air, WaterPower of centuries are ...
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  August 31, 2013, 8:44 am
कुमारी दिया की डिजिटल पेंटिंग 'तिलिस्म' धरती अपनी धुरी पर घूमती है और सूर्य अपनी धुरी पर। धुरी पर घूमने के लिए आकार का वर्तुल होना यानी गोल होना ज़रूरी है। गोल की बजाय चौकोना-तिकोना हुआ तो धुरी लगाएंगे कहाँ! तब तो कोने परस्पर काबिलियत को लेकर ही झगड़ते रहेंगे और धुरी बे...
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  April 12, 2013, 10:54 am
 (1) . कविता के साथ-साथहो सकता है कि अच्छी न बने कविताक्योंकि आँखों में नींद और सिर में भरा है दर्दपर स्थगित नहीं हो सकता लिखनालिखा था कभीकि जीवन की लय को पाना ही कविता हैलय तो अभी भी टूटी नहींपर सराबोर है यह कष्टों और संघर्षो सेनहीं रोकूँगा अब इन्हेंकविता में आने से.ओढ़ँ...
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  December 18, 2012, 1:31 pm
दिया मिश्रा का शीर्षक विहीन फोटोग्राफ पिता को हम चाहें न चाहें पिता हमें चाहें न चाहें वे हमारे पिता होते ही हमारे स्थायी पता हो जाते हैं।पिता की उंगलियाँ पकड़कर हमने चलना सीखा हो कि न हो पिता ही हमारी ज़िन्दगी में रास्तों की वजह बनते हैं।पिता ने गिरने से संभाला हो...
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  December 17, 2012, 8:54 am
मेरी 11 साल की बेटी 'दिया' की डिजीटल पेंटिंग 'टीचिंग्स ऑफ़ लाइफ'सामने भयावह चुनौतियाँ हैं और कई यक्ष प्रश्न एक साथ खड़े हैं ! चारों ओर से उठे अंधड़ों ने मुझ तक आती सूर्य-किरणों का रास्ता रोक लिया है पार्श्व से सपनों के बिलखने के स्वर तेज़ होते जा रहे हैं अभी - अभी मेरे क...
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  December 4, 2012, 4:34 pm
उनके लिए शौक़-ए-इज़्हार है हुनरमेरी तो ज़िन्दगी की अब्सार है हुनर कितने ही सवालात जीता हूँ, पीता हूँ मेरे लिए होता हुआ एतबार है हुनर मुकम्मल का हिस्सा तुम्हें लगता हूँमेरे हिस्से-हिस्से में यलगार है हुनर  ओट से देखने की फितरत क्यों पालें जब बेजल्व-ए-कराती दीदार है ...
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  October 23, 2012, 9:47 am
वह शख्स जो किसी मस्जिद-मंदिर नहीं जाता दरअसल वह आदमी किसी के घर नहीं जाता मस्जिद-ओ-मंदिर में अब जो भीड़-शोर-सोंग हैमैं तो मैं अब वहाँ कोई खुदा-ईश्वर नहीं जाता   मिलाया हाथ, लगाया गले, दी तसल्लियाँ तुमनेतुम्हारे प्यार का शुक्रिया पर मेरा डर नहीं जाता बदला, ओढ़ा, रगड़ा, त...
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  October 15, 2012, 7:49 am
११ मई २०११ को नागपुर के दीनानाथ हाईस्कूल में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की १५० वीं जयंती के निमित्त युवा कवियों के विचार नामक कार्यक्रम आयोजित हुआ. इसमें श्री अरिंदम घोष, श्रीमती इला कुमार, श्रीमती अलका त्यागी, श्री अमित कल्ला के अलावा मैंने यानि पुष्पेन्द्र फाल्गुन ...
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  December 12, 2011, 12:01 pm
आप लोगों की नजर एक कविता, शीर्षक है 'अंतस-पतंगें'परत-दर-परतउघारता हूँ अंतसउधेड़बुन के हर अंतराल परफुर्र से उड़ पड़ती है एक पतंग अवकाश के बेरंग आकाश में.पतंगों केधाराप्रवाह उड़ानों से उत्साहितटटोलता हूँ अपना मर्म मानसपाता हूँ वहाँ अटकी पड़ी असंख्य पतंगेंकहीं गु...
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  November 22, 2011, 9:43 am
यदि आप संरक्षक बनना चाहें तो कृपया अपना चेक इस पते पर संप्रेषित करें :-पुष्पेन्द्र फाल्गुनसंपादक फाल्गुन विश्वद्वारा- विश्वभारती प्रकाशन    तृतीय तल, धनवटे चम्बेर्स,    सीताबर्डी, नागपुर ४४००१२ महाराष्ट्र आप चाहें तो सीधे फाल्गुन विश्व के बैंक खाते में अपनी संरक्षक...
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  October 20, 2011, 7:11 am
जैसे दो किनारों के सहारे आगे बढ़ती है नदी किनारे न हों तो भटक जाएगी नदीकिनारे नदी के भटकाव को रोकते हैंऔर रखते हैं प्रवाहमान उसेकिनारे न हों तो दूर तक कहीं फ़ैल कर नदी ठहर जायेगी...स्वाभाविक तरीके से गतिमान रहना है तो दो की जरूरत अपरिहार्य हैदो पैर हों तो चाल स्वाभाविक ...
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  October 10, 2011, 7:40 am
"क्या आपको सचमुच फर्क नहीं पड़ता!!" मैंने हैरत से उस बुजुर्ग फ़कीर से पूछा था.लगभग हँसते हुए लेकिन अत्यंत दृढ़ स्वर में उन्होंने कहा था, "नहीं."मेरे रुआंसे चेहरे को देखकर उन्हें फिर हंसी आ रही थी. लेकिन उन्होंने हंसी को ज़ब्त करने का अभिनय किया.मैंने लम्बी सांस खींचकर ...
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Tag :Moral
  October 9, 2011, 8:45 am
"हे भगवान्, अब आप हमारे क्लास के बच्चों के गाल और हाथ की रक्षा करना. कल टीचर को नया डस्टर मिल गया है, इस साल का डस्टर बड़ा मज़बूत और मोटा है और टीचर का निशाना भी एक दम पक्का है. अपनी सीट से बैठे-बैठे ही वे किसी का भी गाल लाल कर सकती हैं. कुछ ऐसा करो भगवान् कि टीचर से ये डस्टर ग...
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  June 30, 2011, 7:15 am
सेवाग्राम आश्रम से बापू का चश्मा क्या चोरी हुआ, हाय तौबा मचाने वालों की तो निकल पड़ी. किसी ने सेवाग्राम आश्रम समिति को जमकर कोसा कि उन लोगों ने आखिर इतने महीनों तक चश्मे की चोरी छिपाए क्यों रखी? तो किसी ने पुलिस विभाग को कोसा कि अभी तक चश्मे का कोई सुराग नहीं लग सका. लेकिन...
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  June 28, 2011, 9:36 am
कल इसी कविता को किसी और तरीके से लिखा था. आज  'कविता लेखन' पर अग्रज कवि-आलोचक नन्द भारद्वाज जी के मार्गदर्शन के बाद कल की कविता 'जय भीम कावडे काका, जय भीम' को कुछ इस तरह लिखा है. आप सुधीजनों से  तवज्जों चाहता हूँ ...तनि-तनि से पंख हैं उस सफ़ेद तितली केजिन्हें मासूमियत से ...
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  June 27, 2011, 11:27 am
गाड़ेघाट* के मुहाने परआपको देख विस्मित होती आँखेंआत्मीयता से भर उठेंगीजैसे ही आप उनसे कावडे काका के घर का पता पूछेंगेयों गाड़ेघाट पूरे नागपुर जिले में 'अम्मा की दरगाह' के लिए मशहूर हैलेकिन इधर कावडे काका की वजह से इस गाँव का नामकई लोगों के लिए आदरणीय हो गया है५६ साल पु...
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  June 26, 2011, 9:42 am
१९९५ की सर्दियों की एक सुबह ननिहाल में बैठे-बैठे 'फूट' पड़ीं ये कविताएं. आकार में ये कविताएं अत्यंत छोटी हैं, लेकिन एक ही 'मूड' में लिखी गईं हैं. ये सभी कविताएं 'सो जाओ रात' संग्रह में संकलित हैं. आज इन्हें बहुत सालों बाद पढ़ रहा था, तो लगा कि आप मित्रों से भी इन्हें साझा किया ...
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  June 23, 2011, 2:34 pm
( सुभाष तुलसीता का रेखांकन  )हालाँकि टूटने के बाद बिखरने का डर बना रहता है, लेकिन मैं सोचता हूँ कि टूट ही जाऊं तो बेहतर होगा आखिर कब तक बिखरने के डर सेन टूटने का अभिनय करता फिरूंगाआप मित्रों से अनुरोध है कि मैं बिखरने लगूँ यदि, तो कृपया मुझे समेटने की कोशिश बिलकुल न कीजि...
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  June 18, 2011, 6:34 am
   इसलिए जरूरी है फाल्गुन विश्व का प्रकाशन -- ताकि प्रतिरोध और असहमतियों की आवाजों के लिए जगह बची रहे.- ताकि रूबरू होता रहे आम पाठक अपने समय-सत्ता-समाज से.- ताकि मुझे जीने का मकसद मिले.- ताकि तुम्हें जीने का मकसद मिले.- ताकि बेहतर दुनिया बनाने का हमारा सपना आकार पाए...- ताकि सं...
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  June 17, 2011, 7:42 am
अच्छा हुआ आप यहाँ नहीं हैं, हमारे साथ. अरे साहब हम इस समय महाराष्ट्र की उपराजधानी यानी नागपुर जिले के एक छोटे से गाँव कन्हान में हैं. कन्हान के तुकराम नगर मोहल्ले में किराए से रहते हैं अपन. यदि आप भी कल मेरे साथ यहाँ होते, तो रात भर आपको जागना पड़ता. जी जागना इसलिए पड़ता क्...
पुष्पम...
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  June 16, 2011, 8:42 am
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