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हिंदी कविता-कुछ अनकही कुछ विस्मृत स्मृतियाँ /Ashutosh Nath Tiwari

                   मनुष्य - परिष्कृत सृजन !                         सत्य ने ओढ़  लिया                          असत्य का आवरण।                            भोग की इच्छा,                         भौतिकता की लालसा,                   धन का लोभ,                    मनुष्य नहीं कर सका संवरण।                 करने लगा अंधक...
हिंदी कविता-कुछ अनकही कुछ विस्...
Tag :जीवन और समयचक्र
  March 30, 2012, 7:36 pm
इन रिश्तो के अनुबंधों में,जब एकाकी हो जाता हूँ,जब अपनी ही परछाई को,खुद से ही उलझता पाता हूँ।तब जीवन जीने की इच्छा,कुछ और प्रबल हो जाती है.जब अपनी ही खुद की छाया, खुद से ही बड़ी में पाता हूँ।इन रिश्तो के अनुबंधों में,जब एकाकी हो जाता हूँ।।ये रिश्ते तो ऋतुओं जैसे,झट पतझड़ मे...
हिंदी कविता-कुछ अनकही कुछ विस्...
Tag :निराशा एवं विषाद
  December 16, 2011, 9:17 pm
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