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आज भगवान विष्णु के साक्षात् दर्शन हुए. एक विशेष किस्म की जिज्ञासा और उत्कण्ठा पिछले कुछ महीनों से 'हमरी खोपड़िया' में व्याप्त थी. मन में व्याकुलता और शरीर में एक मद्धिम सा कंपन. जिसमें कुछ तेजी महसूस होती थी आश्चर्य वाले पलों में... और हम कनफ्यूज हो जाते... एतना कनफ्यूज कि ...
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  July 7, 2013, 1:11 pm
कुछ चीजों को हम तलाश करते हैं और कुछ चीजें हमें तलाश करती हैं, लेकिन वे चीजें भौतिक नहीं होती. उनका कोई निश्चित रंग रूप नहीं होता, सिर्फ महसूस भर होती हैं और अपनी मौजूदगी का एहसास जताकर अदृश्य सी हो जाती हैं.. उनके होने से यदि सुखद एहसास होता है तो.. उनके जाने पर एक छटपटाहट ...
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  April 7, 2013, 2:47 am
वह रहस्यमयी है.. एक खूबसूरती लिये हुए…  वह आकर्षित करती है.. जीवंत कर देने वाली… इस वसुधा को… हमारी जरूरत है?! ~~* मनीष *~~...
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  March 27, 2013, 12:04 am
  एक मद्धिम सी रोशनी कोहरे की महीन चादर से लिपटी हुई, और दिशायें अजनबी सी लगती हैं.    एक अनसुनी सी आहट धड़कनों में घुली हुई, और गिलहरियाँ, एकाएक चौंक सी जाती हैं.   कुछ अनसुना सा सन्नाटा, कभी कभी अपनी चुप्पी तोड़कर कुछ कहना चाहता है. - मनीष...
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  January 31, 2013, 7:50 pm
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  December 30, 2012, 4:41 am
वह बसन्त ऋतु का आगमन था, जब बागों में रंग-बिरंगे फूल खिल उठे थे. उस दिन प्रकृति ने कुछ विशेष प्रकार के पुष्प उनके धड़कते दिलों में भी खिला दिये थे. प्रभात की पहली किरण के साथ वह टोकरी लेकर बाग की तरफ चल पड़ा था, पूजा के लिये उसे कुछ फूल चुनने थे. वहाँ वह उससे पहले पहुँच चुकी थ...
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  October 14, 2012, 12:37 pm
एक समय था जब उसने उसे एक सफेद रंग का फूल दिया था और उसने मुस्कुराकर कहा था - "अरे यह तो शहनाई जैसा दिखता है." वह बहुत खुश हुई थी उस दिन..!! एक समय ऐसा भी आया, जब उसे उसकी सहेली ने पौधों के एक झुण्ड को दिखाकर कहा था - देखो, बेहया के पेड़ यहाँ भी उगें हैं. उसने उन पौधों पर वही सफेद ...
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  September 13, 2012, 12:07 pm
आज कुछ तस्वीरों के साथ गीतों भरी कहानी कहने का मन है. गीत को आप यहाँ से शुरू सकते हैं, कहानी समझने में सुविधा रहेगी. तो पेश है पहली तस्वीर!! हमारा नया ठिकाना... इस गीत को गुनगुनाते हुए.. "मुसाफिर हूँ यारों.. ना घर है ना ठिकाना.. मुझे चलते जाना है.. बस, चलते जाना..."   इस मुसाफिर ...
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  August 7, 2012, 8:56 pm
कुछ चीजें ऐसी होती हैं जो कभी पिण्ड नहीं छोड़ती. उदाहरण हेतु – पति के लिये पत्नी, विद्यार्थी के लिए किताबें, शिक्षक के लिये छात्र, हीरो के लिये हीरोइन-कम-गुण्डा वगैरह!! ठीक इसी प्रकार मेरे लिये एक टिपिकल नियति का होना. यह नियति कुछ ऐसी है कि लाख पिण्ड छुड़ाओ लेकिन वह पीछे ...
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  July 30, 2012, 3:37 pm
एक विज्ञान का रिसर्च स्कॉलर एकाएक कवि बन गया. उसने बड़ी मुश्किल से दो लाइनें लिखी, References के साथ.... और मेरे पास Review के लिए भेजा.. वही पेश है – नज़रों में चढ़ गया हूँ, तेरे चाहने वालों कीउन्हें शक है शायद, तुम्हें मुझसे मुहब्बत है. References -१. प्रोफेसर शुक्ला et al. (२०१२)२. आदर्श सोसाइटी et...
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  July 8, 2012, 5:50 pm
शाम को पार्क गया था, लेकिन अच्छा नहीं लगा. आज मेरी गर्लफ्रेंड नही आयी थी न!! अच्छा कैसे लगता? आपको बताना भूल गया था कि तीन दिन पहले मेरी एक गर्लफ्रेंड बनी थी. मैं घासों पर बैठा मन्द हवा का लुत्फ उठा रहा था और वह मन्द हवा के साथ पार्क की हरी घासों पर खेल रही थी. हरी घासों में छि...
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  July 7, 2012, 4:54 am
एक एहसास का फर्क है और एक महीन सी पतली परत होती है, जिसके उस पार की दुनिया बदलाव महसूस कर रही होती है और इस पार स्थिरता ठूँठ सी खड़ी रहती है.   धूल भरी दुपहरिया तेज चलती लू में वह भागकर, उसके लिए अपने कुछ मिट्टी के खिलौने उठा लाया था और वह मन्द मन्द मुस्कुरा रही थी उसके घर म...
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  May 14, 2012, 4:47 pm
  प्यार के सागर में दोनों ने खूब अटखेलियाँ की थी. हवा का स्पर्श और बूँदों का प्रहार एक लम्बे अरसे तक दोनों ने महसूस की थी.   हाथ छूट गये थे जब वह लहर आकर उनसे टकराई थी वह तैरते हुए दूर किनारे पर निकल गयी थी और वह डूबता गया था…. बस डूबता गया था.   वह प्रेम की तलहटी थी जहाँ ढेरो...
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  May 9, 2012, 1:49 am
बन्द आँखों से हमने एक सपना बुना था. आँख खुली, तो रोशनी से आँखें चुधिया गयी.   ओस की बूँदें आज भी बिखर जाना चाहती है काटों के बीच वह सुर्ख लाल फूल आज भी मुस्कुरा देता है तेरे पास जाने को वे न जाने कैसे सपने बुना करते हैं.   रास्ते अब भी निहारते हैं तुम्हें, दूर से चेहरा उठाकर,...
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Tag :कविता
  April 23, 2012, 10:21 am
  वह एक छोटी सी बात थी जब उसने धिक्कार दिया था सारी अच्छाईयाँ, उस दिन रो पड़ी थी कुछ सुबकती रही एक कोने में और कुछ, एकटक पुराने रास्ते को घूरती रही   उनमें से कुछ आज घर के चौखट को घूर रही हैं और कुछ बैठी सुबक रही हैं आँगन के एक कोनें में एक छोटी सी बात ने घर का बँटवारा कर दि...
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  March 1, 2012, 8:23 pm
मैनें एक दिन पानी को देखा. मुझे प्यास लगी थी तो स्वार्थवश पूछ लिया – क्या हाल चाल है भाई? आजकल तो नजर ही नहीं आते. पानी ने व्यंग्यवश मुझसे पूछा – तुम भी तो नजर नहीं आते. मैनें हँस कर कहा – ‘कम्पटीशन’ दे रहा हूँ यार.. आदमी कोऑपरेशन के वक्त नजर आता है. पानी ने चिढ़ाते हुए उत्तर ...
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  February 28, 2012, 9:58 am
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  February 27, 2012, 2:48 pm
कुछ दिनों तक यहाँ वहाँ भटकने के बाद हमने एक प्लेटफार्म चुन लिया है. अब ज्यादा भटकाव न हो सकेगा. मन के विचारों को एक सूत्र में बाँधने का मान होगा "मनोभूमि" पर... और इस इस भूमि पर सिर्फ लघु लेखन. :)...
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  October 1, 2011, 3:36 pm
  समवेत गाती गुनगुनाती कुछ औरतों का समूह  ढोल की धुन पर नाचता झूमता हुआ   संगीत की मस्ती में पूरी हो रही थी, कुछ रस्में जिनमें लुटाये जा रहे थे मिष्ठान और भोजन   दिन भर की थकान समेटे सूरज पेड़ों की आड़ में छिपने की कोशिश करता हुआ     पंक्षियों की कतारबद्ध श्रृंखला उपर से...
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  August 3, 2011, 3:33 pm
  रात के सन्नाटे उकेर देते हैं, उसकी छवि परिवार के झगड़ों से सहमी किवाड़ की ओट से निहारती दो प्यारी सी आँखें   उन झगड़ों के साथ उसके आँसू भी रूकते हैं और तब तक वे आँखें सूज चुकी होती हैं - मनीष...
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  July 25, 2011, 11:44 am
  प्यार करता हुआ एक प्रेमी जोड़ा अपने सपनों को मूर्त रूप देता हुआ   आलिंगन बद्ध होकर एक दूसरे से लिपटे हुए प्यार भरी बातें करता हुआ   एकाएक प्रेमिका झुँझलाकर उठती है, और चीख कर कहती है - “यू बास्टर्ड!! तुम्हारी यह सोचने की हिम्मत कैसे हुई?”  - मनीष...
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  July 25, 2011, 11:32 am
शाम हुई तो डिनर हेतु कुछ सब्जियाँ खरीद लाने की इच्छा हुई लेकिन आलस एक ऐसी बला का नाम है जो त्वरितरूप से सक्रिय होते हुए आपको व्रत रखने पर मजबूर कर दे.उसने बर्तनों की दुर्दशा और आटे की कमी की तरफ इंगित किया और यह सलाह दी कि एक मैगी का पैकेट उठा लाओ, क्यूँ बदन को तकलीफ देते ह...
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Tag :हास्य
  July 23, 2011, 10:42 am
बुधवार की सुबह, शरीरपर ज्यादा जोर आजमा लिया था और प्राणायाम के चलते उपर नीचे होती साँसों कासम्पूर्ण आभास हो रहा था. चेहरे पर ताजगी के ज्यादातर नमूने पसीने की ओट में छिप रहे थे. इसी बीच किताबों के बीच छिपा चरित्र प्रमाण पत्र हेतु आवेदन का टुकड़ा फैन अर्थात पंखे की गुर्रा...
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Tag :हास्य
  July 21, 2011, 3:55 pm
आज एक किताब खोजते हुए एक पुरानी सी डायरी हाथ लग गयी. न जाने कैसे.. यह गंगा स्नान से वंचित रह गयी थी. पुरानी स्मृतियों से तंग आकर अपने कई दार्शनिक विचार संगम में विसर्जित कर आये थे. लेकिन जब स्वरचित पांडुलिपियों से मेरा सामना हुआ तो बहुत जोरों की हँसी आई थी.सन्‌ २००२, २८ जून...
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Tag :हास्य
  July 14, 2011, 12:13 am
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