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किरण की दुनिया

बचपन में मालवा के बिताए सालों में मां के साथ जब भी बाज़ार जाती थी तो काकीजी के हाथ से बनी डबल लौंग सेव खाना कभी नही भूलती वो मुझे इतने पसंद थे कि उनके लिए मैं कुछ भी छोड़ सकती थी। लेकिन खाते ही जो मुंह जलता सो बस की बोलती बंद ।जबान की बोलती बंद आंखे बोलती वो भी आंसुओ की भाषा.... ...
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  July 19, 2019, 11:52 am
युग--------------वायुहीन नि:श्वास के परेशून्य से उभरे जगत मेंसत असत् रज भी अस्तित्व में नहीं था,न ही उसके परे  आकाशउष्मा ने न  उत्पन्न किया था जल,न जल ने उत्पन्न किया था अन्न,न अंडज हुआ था न अकुंरन मृत्यु न अमरत्त्व ,न रात न दिनतब स्वरोदय के साथप्रकट होती हूं मैंनिर्बंध भ्रमण ...
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  July 17, 2019, 2:58 pm
'स्नो पियर्सर'के अमेरिकी डिस्ट्रीब्यूटर टॉम क्विन का कहना है, जलवायु परिवर्तन के बाद की स्थितियों को दिखाने वाली फिल्म नई पीढ़ी को प्रभावित करें तो शायद बहुतायत में लोग पर्यावरण के प्रति जागरूक हो । गॉडजिला बनाने वाले एडवड्रस का कहना है, 'गॉडजिला'जैसी फिल्म हमने ज...
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  July 11, 2019, 12:01 pm
ये आवाज किसकी है राट, त्रमझड़, त्राटकणों और धरहरणो  है क्या ये ...या छोल है जो आनन्द से मुझे भर रह है क्या आप  सोकड़ की आवाज पहचानते है ? आप मे से अधिकाशत: कहेंगे कि ये क्या है ? ये प्रश्नवाचक वाक्य सिर्फ आज ही नही आने वाले कल में भी आपको परेशान करता रहेगा क्योंकी हमारे जी...
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  June 29, 2019, 9:37 am
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुंजकोटरे वसन्विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् ।विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकःशिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ।।तो क्या शिवताण्डवस्तोत्रम्’ के १३ वें श्लोक में स्तुतिकार रावण अविरल प्रेमयुक्त तरल-सरल भावों के साथ अपने मन ...
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  May 8, 2019, 9:48 pm
वैशाख भारतीय काल गणना के अनुसार वर्ष का दूसरा माह है। इस माह को एक पवित्र माह के रूप में माना जाता है। जिनका संबंध देव अवतारों और धार्मिक परंपराओं से है। ऐसा माना जाता है कि इस माह के शुक्ल पक्ष को अक्षय तृतीया के दिन विष्णु अवतारों नर-नारायण, परशुराम, नृसिंहऔर ह्ययग्री...
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  May 7, 2019, 5:34 pm
आगाही कार्ब वफ़ा सब्र तमन्ना एहसासमेरे  ही  सीने  में  उतरे  हैं  ये  खंज़र सारेबशीर फ़ारूक़ी जी ने शायद हम जैसो का दिल पढ़ कर ही ये शेर कहा होगा....दो महीने की घर से बाहर व्यस्ता के चलते अव्यवस्थित घर से रूबरू होते ही सबसे पहले गर्म- ठंडी के कपड़े रखते उठते बेटी अपनी घा...
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  April 30, 2019, 10:55 am
बेजुबान लब्जझुकी डालढीठ सी लाजचीरती जब मधुर भय कोरचती अधलगी महावरतुम विवशमैं अवशबचपन में मालवा के बिताए सालों में मां के साथ जब भी बाज़ार जाती थी तो काकीजी के हाथ से बनी डबल लौंग सेव खाना कभी नही भूलती वो मुझे इतने पसंद थे कि उनके लिए मैं कुछ भी छोड़ सकती थी। लेकिन खाते ह...
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  April 28, 2019, 11:07 am
1-प्रेम 💝तेरी मेरी जुडी  हथेलियां ईश्वर का घर है 🌷ये जो अंधकार से भरा खालीपन देख रहे हो नउसी से तो निकलेंगे उल्कापिंड की भांति प्रेम पलइससे पहले कि ये तुम्हें आशा का क्षणिक आभास देकर छोड़ दे तुम्हारा साथ ,तुम्हें मिलाने होंगे इस लाल धूसर मिट्टी में आस्था के सारे वो चिन...
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  February 25, 2019, 8:27 pm
रोपा रोपे गेले रे डिंडा दंगोड़ी गुन्गु उपारे जिलिपी लगायेलाजो नहीं लगे रे डिंडा दंगोड़ी गुन्गु उपारे जिलिपी लगायेहर जोते गेले रे डिंडा दंगोड़ा एड़ी भईर तोलोंग लोसाते जायेलाजो नहीं लगे रे डिंडा दंगोड़ा एड़ी भईर तोलोंग लोसाते जाये।कितना उल्लास है इस लोकगीत मेंहल जोतते हु...
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  November 12, 2018, 9:31 am
हवा में ठंडक है शायद गांव में कांस फूला हैआज धूप का मिजाज़ किसी प्रेमिका सा है जो बार-बार छत पर आती जाती है इंतजारे इश्क में । बाहर हल्का शोर है लेकिन भीतर शून्य है। ये दिल्ली शहर है जहां अक्सर इंसान शून्य  में ही रहता है मानसिक शून्यता,वैचारिक शून्यता। सड़के भरी नहीं&nbs...
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  September 29, 2018, 9:37 pm
भूख के रूदन कोशांत कराती स्त्री रचती है गीतऔर इस तरहभूख के भय को करती है कमउदगीथ, रचिता को अन्न से कर धन्यचल पड़ता हैगुंजाते गूंजतेतमाम युद्धों, बर्बरता सेसभ्यताओं को सुरक्षितबचाने के लिएकंगूरे पर बंधा उदगीथ*अब निश्चेष्ट है लेकिन निराश नहींवो तोड़ता है छंद ,ललकारता है...
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  September 17, 2018, 3:44 pm
समय के भाल पर न जाने कितनी गीत- संगीत सजे है न जाने जिंदगी ने कितने रूप धरे है ।प्रकृति की सारी थिरकन सिर्फ उसी से हैजिगर की पीर हल्की और दिल से रूह के रिश्ते पुख़्ता सिर्फ उसी से हो जाते है ।जिंदगी की जद्दोजहद, पसोपेश,अंतर्विरोध सब पर अचानक विराम लग जाता है ।कौन है वो जो पल...
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  September 7, 2018, 9:50 am
🇮🇳 🇮🇳स्वतंत्रता का आलोकहर तरफ फैला ही था किअपनी- अपनी पताका के साथअपने -अपने उदघोष हुएद्वार पर ही स्वतंत्रता ठिठक गईप्रकाश की किरणें धीरे- धीरे काट दी गईस्वतंत्रता का सूर्य खंडित होक्षत विक्षत हो गयाकुछ उत्साही जाग्रत हुएअब सत्ता के शिखरों परअवतार जन्म लेने लगेअव...
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  August 15, 2018, 1:21 pm
रामरती (एक थी रामरती ) अपनी निर्भीकता कई पीढ़ियों में बाँट कर आखिर अपनी कोशिश में कामयाब हो ही जाती  और तैयार कर ही देती है न जाने कितनी मणिकर्णिका।दरवाजे की ओट से झांकती आंखे तो कुछ नीची निग़ाह अचानक तीखी होकर अपने लिए रास्ता बनाती है और पारे उन रास्तों को आसान बनाने का ...
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  April 1, 2018, 10:07 pm
वो जहाँ हम मिलते थे खेत कितने होते थे हरे पीले और किसान कितने होते थे खुश गुड की मीठी खुशबू हवा में तैरती चिपक जाती थी हमारे चेहरे पर उसका जायका जैसे कच्ची उम्र का हमारा प्रेम खेत के बीचो बीच खड़ा वो बिजूका जिसके न जाने कितने नाम रख छोड़े थे तुमने जिसे देख कर हमारे साथ साथ ध...
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  March 12, 2018, 10:42 am
पुरुषों के नाम पत्र------------------------एक पत्र जो आप को वो पात्र बना देगा जिसकी कोशिश आप एक युग से कर रहे है....सारी दुनिया औरत के इर्द गिर्दऔरत की दुनिया चूल्हे के इर्द गिर्द।आप श्रेष्ठ है और हम हीन इस भावना से मुक्त हो...जरुरी है बेहतर समाज के लिएश्रम की परिभाषा मानवीय मूल्यों पर आ...
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  March 8, 2018, 11:35 am
एक अंतहीन रात मेंएक औरत तोडना चाहती है दुस्वप्न के जालों कोवो छाती की दर्दनाक गांठ में दबेउस शून्य को निकाल देना चाहती हैजो हर चीख के साथ बढ़ता जाता हैऔर हटाना चाहती हैइर्द गिर्द जमा डर की बीट कोवो रखना चाहती थी जिंदासत्य, न्याय, प्रेम की कहानियों को भीजो पिछली रात उसन...
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  March 5, 2018, 10:58 pm
कुछ ठेके पर उठी कविताएंअपने आप पर रश्क़ कर सकती है उनके मालिक कुछ ख़ास किस्म के होते है। दुनिया उन्हें सलाम करती है।वैसे सजदा करते उनकी भी उम्र बीत रही है।कुछ इतनी खुशकिस्मत नहींवो फुटपाथ पर ही जन्म लेकर वही मर जाती है हालाँकि मुझे ख़ुशी है कि वो उनकी तरह नहीं जिनकी रूह तक...
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  February 12, 2018, 7:39 pm
घनघोर अंधेरे में जो दिखती है,वो उम्मीद है जीवन कीहिंसक आस्थाओं के दौर में प्रार्थनाएं डूब रही हैअन्धकार के शब्द कुत्तों की तरह गुर्रातेभेड़ियों की तरह झपट रहे हैउनकी लार से बहते शब्दलोग बटोर रहे है उगलने कोजर्जर जीवन के पथ पर पीड़ा के यात्रीटिमटिमाती उम्मीद को देखते ह...
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  January 30, 2018, 9:54 pm
ले चल मुझे भुलावा दे कर मेरे नाविक धीरे-धीरेजिस निर्जन में सागर लहरी, अम्बर के कानों में गहरीनिश्चल प्रेम कथा कहती हो तज कोलाहल की अवनि रे”( जयशंकर प्रसाद) कभी कभी नाविक अकेला ही सागर पर किसी अनजाने गांव का दरवाजा खटखटा देता है💕❤🍁किसी अनजाने गाँव मेंअनजाने घर की कभी ...
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  January 27, 2018, 4:42 pm
बीते बरस बीत गए ये सोच कर की आने वाले बरस कैसे बीतेंगे थोड़ी सी ख़ुशी देकर या बेरुखी से मुह मोड़ कर फिर चल देंगे ,साथ छोड़ कर। ये क्रम यूं ही चलेगा ,ये रहा गुजर रहेंगे हमारी अंतिम घड़ी तक ।लोग बतियाना चाहते है लेकिन बाते नहीं हैं। हालांकि हम वैश्विक हो गए है लेकिन ये हो कर कोलाह...
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  January 1, 2018, 12:12 pm
एक था सरवनपालकी उठाता थाजेठ की लू मेंपूस के जाड़े मेंगीत गाता थाचैता सुनाता थासरवन की पालकी मेंठहर गया एक दिनचुलबुला वसंतप्रीत कुसुंभ के संगफिर प्रेम रंगा, फागुन रंगारंग गया वसंतप्रीत कुसुंभ के संगअब पग फेरा नहींवसंत ठहरा वहीइतिहास हुआ क्रुद्धमौसम हुआ रुद्धइतिहास...
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  December 29, 2017, 6:00 pm
उसकी पीठ पर बैजनी फूल बंधे थे और हाथ में सपने अभी अभी उगे पंख उसने करीने से सजा रखे थे कुछ जुगनू उसके होठों पर चिपके थे कुछ हँसी बन आसमान मेंवो एक सर्द रात थी जब हम नक्षत्रों के नीचे चल रहे थे और चाँद मेरे साथ हिम खंड के पिघलने तक मैं उसका साथ चाहता था उसे...
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  December 16, 2017, 8:50 pm
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