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किरण की दुनिया

रोपा रोपे गेले रे डिंडा दंगोड़ी गुन्गु उपारे जिलिपी लगायेलाजो नहीं लगे रे डिंडा दंगोड़ी गुन्गु उपारे जिलिपी लगायेहर जोते गेले रे डिंडा दंगोड़ा एड़ी भईर तोलोंग लोसाते जायेलाजो नहीं लगे रे डिंडा दंगोड़ा एड़ी भईर तोलोंग लोसाते जाये।कितना उल्लास है इस लोकगीत मेंहल जोतते हु...
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  November 12, 2018, 9:31 am
हवा में ठंडक है शायद गांव में कांस फूला हैआज धूप का मिजाज़ किसी प्रेमिका सा है जो बार-बार छत पर आती जाती है इंतजारे इश्क में । बाहर हल्का शोर है लेकिन भीतर शून्य है। ये दिल्ली शहर है जहां अक्सर इंसान शून्य  में ही रहता है मानसिक शून्यता,वैचारिक शून्यता। सड़के भरी नहीं&nbs...
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  September 29, 2018, 9:37 pm
भूख के रूदन कोशांत कराती स्त्री रचती है गीतऔर इस तरहभूख के भय को करती है कमउदगीथ, रचिता को अन्न से कर धन्यचल पड़ता हैगुंजाते गूंजतेतमाम युद्धों, बर्बरता सेसभ्यताओं को सुरक्षितबचाने के लिएकंगूरे पर बंधा उदगीथ*अब निश्चेष्ट है लेकिन निराश नहींवो तोड़ता है छंद ,ललकारता है...
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  September 17, 2018, 3:44 pm
समय के भाल पर न जाने कितनी गीत- संगीत सजे है न जाने जिंदगी ने कितने रूप धरे है ।प्रकृति की सारी थिरकन सिर्फ उसी से हैजिगर की पीर हल्की और दिल से रूह के रिश्ते पुख़्ता सिर्फ उसी से हो जाते है ।जिंदगी की जद्दोजहद, पसोपेश,अंतर्विरोध सब पर अचानक विराम लग जाता है ।कौन है वो जो पल...
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  September 7, 2018, 9:50 am
🇮🇳 🇮🇳स्वतंत्रता का आलोकहर तरफ फैला ही था किअपनी- अपनी पताका के साथअपने -अपने उदघोष हुएद्वार पर ही स्वतंत्रता ठिठक गईप्रकाश की किरणें धीरे- धीरे काट दी गईस्वतंत्रता का सूर्य खंडित होक्षत विक्षत हो गयाकुछ उत्साही जाग्रत हुएअब सत्ता के शिखरों परअवतार जन्म लेने लगेअव...
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  August 15, 2018, 1:21 pm
रामरती (एक थी रामरती ) अपनी निर्भीकता कई पीढ़ियों में बाँट कर आखिर अपनी कोशिश में कामयाब हो ही जाती  और तैयार कर ही देती है न जाने कितनी मणिकर्णिका।दरवाजे की ओट से झांकती आंखे तो कुछ नीची निग़ाह अचानक तीखी होकर अपने लिए रास्ता बनाती है और पारे उन रास्तों को आसान बनाने का ...
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  April 1, 2018, 10:07 pm
वो जहाँ हम मिलते थे खेत कितने होते थे हरे पीले और किसान कितने होते थे खुश गुड की मीठी खुशबू हवा में तैरती चिपक जाती थी हमारे चेहरे पर उसका जायका जैसे कच्ची उम्र का हमारा प्रेम खेत के बीचो बीच खड़ा वो बिजूका जिसके न जाने कितने नाम रख छोड़े थे तुमने जिसे देख कर हमारे साथ साथ ध...
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  March 12, 2018, 10:42 am
पुरुषों के नाम पत्र------------------------एक पत्र जो आप को वो पात्र बना देगा जिसकी कोशिश आप एक युग से कर रहे है....सारी दुनिया औरत के इर्द गिर्दऔरत की दुनिया चूल्हे के इर्द गिर्द।आप श्रेष्ठ है और हम हीन इस भावना से मुक्त हो...जरुरी है बेहतर समाज के लिएश्रम की परिभाषा मानवीय मूल्यों पर आ...
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  March 8, 2018, 11:35 am
एक अंतहीन रात मेंएक औरत तोडना चाहती है दुस्वप्न के जालों कोवो छाती की दर्दनाक गांठ में दबेउस शून्य को निकाल देना चाहती हैजो हर चीख के साथ बढ़ता जाता हैऔर हटाना चाहती हैइर्द गिर्द जमा डर की बीट कोवो रखना चाहती थी जिंदासत्य, न्याय, प्रेम की कहानियों को भीजो पिछली रात उसन...
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  March 5, 2018, 10:58 pm
कुछ ठेके पर उठी कविताएंअपने आप पर रश्क़ कर सकती है उनके मालिक कुछ ख़ास किस्म के होते है। दुनिया उन्हें सलाम करती है।वैसे सजदा करते उनकी भी उम्र बीत रही है।कुछ इतनी खुशकिस्मत नहींवो फुटपाथ पर ही जन्म लेकर वही मर जाती है हालाँकि मुझे ख़ुशी है कि वो उनकी तरह नहीं जिनकी रूह तक...
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  February 12, 2018, 7:39 pm
घनघोर अंधेरे में जो दिखती है,वो उम्मीद है जीवन कीहिंसक आस्थाओं के दौर में प्रार्थनाएं डूब रही हैअन्धकार के शब्द कुत्तों की तरह गुर्रातेभेड़ियों की तरह झपट रहे हैउनकी लार से बहते शब्दलोग बटोर रहे है उगलने कोजर्जर जीवन के पथ पर पीड़ा के यात्रीटिमटिमाती उम्मीद को देखते ह...
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  January 30, 2018, 9:54 pm
ले चल मुझे भुलावा दे कर मेरे नाविक धीरे-धीरेजिस निर्जन में सागर लहरी, अम्बर के कानों में गहरीनिश्चल प्रेम कथा कहती हो तज कोलाहल की अवनि रे”( जयशंकर प्रसाद) कभी कभी नाविक अकेला ही सागर पर किसी अनजाने गांव का दरवाजा खटखटा देता है💕❤🍁किसी अनजाने गाँव मेंअनजाने घर की कभी ...
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  January 27, 2018, 4:42 pm
बीते बरस बीत गए ये सोच कर की आने वाले बरस कैसे बीतेंगे थोड़ी सी ख़ुशी देकर या बेरुखी से मुह मोड़ कर फिर चल देंगे ,साथ छोड़ कर। ये क्रम यूं ही चलेगा ,ये रहा गुजर रहेंगे हमारी अंतिम घड़ी तक ।लोग बतियाना चाहते है लेकिन बाते नहीं हैं। हालांकि हम वैश्विक हो गए है लेकिन ये हो कर कोलाह...
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  January 1, 2018, 12:12 pm
एक था सरवनपालकी उठाता थाजेठ की लू मेंपूस के जाड़े मेंगीत गाता थाचैता सुनाता थासरवन की पालकी मेंठहर गया एक दिनचुलबुला वसंतप्रीत कुसुंभ के संगफिर प्रेम रंगा, फागुन रंगारंग गया वसंतप्रीत कुसुंभ के संगअब पग फेरा नहींवसंत ठहरा वहीइतिहास हुआ क्रुद्धमौसम हुआ रुद्धइतिहास...
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  December 29, 2017, 6:00 pm
उसकी पीठ पर बैजनी फूल बंधे थे और हाथ में सपने अभी अभी उगे पंख उसने करीने से सजा रखे थे कुछ जुगनू उसके होठों पर चिपके थे कुछ हँसी बन आसमान मेंवो एक सर्द रात थी जब हम नक्षत्रों के नीचे चल रहे थे और चाँद मेरे साथ हिम खंड के पिघलने तक मैं उसका साथ चाहता था उसे...
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  December 16, 2017, 8:50 pm
पद्मावतीइतिहास की वीथिका में भटकतीक्या सोच रही हो ,खिलजी चला गया ?देह की राख से शांति के महल मत बनाओठुड्डी पर बने तुम्हारे तिल की चाहत लिएलौटता आदमखोर बांट रहा हैबाल मन को आदम वासना के विचारअब वोजिंदगी के गुजरते कारवां मेंमौत के हरकारा बन घर के आँगन में , आँगन के बहारअक...
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  December 15, 2017, 11:08 am
मानव समाज जब ताम्रयुग में पहुंचता हैसंस्कृति जब ग्रामीण पृष्ठभूमि पर खडीचरखे से बनाती है सभ्यताओं के विकास के धागेजिन का छोर पकड़प्राचीन जगत की नदीघाटी सभ्यताएंनगरों की स्थापना के लिएकरती है प्रसव लिपियों कातब ग्राम और नगर के बीचएक स्वर धीरे धीरे पनपता हैजो व्यंजन ...
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  December 5, 2017, 11:32 am
प्रेम की निर्जनता में उदासी हमेशा स्लेटी रंग की क्यों होती है?यही पूछा था न मैं नेऔर तुमने हस कर कहा थाबिना संकट के कुछ भी सार्थक की प्रति संभव कहां,संभव तभी हैजब मन के पथ में दूसरे की गंध भरी होशारदीय धूप का केसरिया रंग किन्हीं अक्षांशो पर खिलाना ही होता है मयूख....सच कहा ...
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  October 9, 2017, 12:37 pm
प्रेम की निर्जनता में उदासी हमेशा स्लेटी रंग की क्यों होती हैयही पूछा था न मैं नेऔर तुमने हस कर कहा थाबिना संकट के कुछ भी सार्थक की प्रति संभव कहांसंभव तभी हैजब मन के पथ में दूसरे की गंध भरी होशारदीय धूप का केसरिया रंग किन्हीं अक्षांशो पर खिलाना ही होता है मयूख....सच कहा ...
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  October 6, 2017, 5:07 pm
जिंदगी मौत भी एक उम्र में मालूम हुआ।मेरा होना था महज़ मेरे न होने के लिए।।स्व. कुंवर रघुवीरसिंह ने सच ही लिखा इस दुनिया में प्रत्येक चीज का मूल्य चुकाना पढता है और जो जीवन उसने दिया है उसका भी मूल्य वो मृत्यु से ले लेता है तभी तो कहा गया है जगत मिथ्या ।स्पिनोजा ने सच लिखा ...
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  August 31, 2017, 11:02 am
पीड़ा की नीव में दबी वासना सुखी हो उठीजब जब स्त्री करहाई ,चिल्लाईऔर इस तरह बर्बर दंड ने जन्म लिया इस पृथ्वी परहर करहाने के बाद शिकारी बढते गएपहला शिकारी कोई आदि अमानुष थाढेंकुल ने मधुर वचनों के दंड में फरेब घोलाप्रेम की रस्सी से वासना का कूंड़ भराकुइयां अब रीति थीये बु...
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  August 27, 2017, 9:51 pm
स्वतंत्रता का पौधा शहीदों के रक्त से फलता है लेकिन स्वतंत्रत हुए पौधें को स्वाधीन रहने के लिए किस तरह के हवा, पानी की जरुरत पड़ेगी ये विचार अपने आप में स्वतंत्रता के सही अर्थ को परिभाषित करने के लिए एक कदम साबित हो सकता है।ये विचार अगर हमने स्वतंत्रता के पूर्व ही कर लिया...
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  August 20, 2017, 4:44 pm
दुनिया की सारी चीख़ें मेरे जहान में हैजेहन में रहना कोई अच्छी बात नहींइससे मांगने का डर रहता हैइंसाफ दर्द देता हैमेरे अंदर एक चुप्पी हैजिसे सुनकरखिड़कियां खड़कती हैमैं ने एक हिमाकत कीखिड़कियां खोलने कीउसूलों ने मुझे नेस्तनाबूत कर दियाअब खंडहर भी नहींसिर्फ चौकटे बचे...
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  July 24, 2017, 7:04 pm
दरवेश से होते है पत्तेयहां वहां बिचरते हुयेबेनियाज़शाखों पर लगे ये करते हैं जुहदअतीत के गुम ये यायावरनिकल आते हैकच्ची दीवारों पुराने खंडहरों सेऔर पहुंच जाते है सर्द रातों मेंदहकते आवा मेंइंतजार करते लोगो कोदेते है दिलासा और करते है गर्म रिश्तों कोइनके दिल पर जो लकी...
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  July 5, 2017, 10:24 am
स्फटिक की छत कुछ देर पहले की बारिश से धुल कर किसी नायिका की हीरे की लौंग सी चमक रही है । छत के कोने पर रातरानी की डाल जैसे चूमना चाहती है उन सफेद लिहाफ को जो आधे खुले पडे है। अभी अभी हवा के हल्के झोके से लिहाफ का आंचल रातरानी ने भर दिया है। ऊपर अंबर में बड़े से बादलो के समूह स...
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  July 1, 2017, 5:29 pm
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