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अमृत-वाणी

संसार से हमें वही मिल रहा है, जो हमने पूर्व में संसार को दिया था।भविष्य में भी हमको वही मिलेगा, जो आज हम संसार को दे रहे हैं॥चाहे वह प्रेम हो ....या धोखा!...
अमृत-वाणी...
रवि कान्त शर्मा
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  October 31, 2015, 7:11 am
धर्म और अधर्म की परिभाषा कार्य का उद्देश्य निर्धारित करता है, एक ही कार्य धर्म और अधर्म दोनों ही हो सकता है।जब कार्य का उद्देश्य स्वार्थ-सिद्धि होता है तो वह कार्य अधर्म कहलाता है, और जब उसी कार्य को परमार्थ-सिद्धि के उद्देश्य से किया जाता है तो वही कार्य धर्म कहलाता है...
अमृत-वाणी...
रवि कान्त शर्मा
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  June 10, 2015, 9:17 am
ज्ञानी का अहंकार शास्त्र को शस्त्र बना देता हैं।शास्त्रों से जीवन का विकास होता हैं, और शस्त्रों से जीवन का विनाश होता हैं।...
अमृत-वाणी...
रवि कान्त शर्मा
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  June 7, 2015, 9:55 am
प्रार्थना से ध्यान श्रेष्ठ है।प्रार्थना में हम भगवान को अपनी सुनाते है, लेकिन ध्यान में हम भगवान की सुनते हैं।...
अमृत-वाणी...
रवि कान्त शर्मा
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  June 3, 2015, 8:50 am
जिस प्रकार गंगा में मिलकर सभी प्रकार के अपवित्र जल गंगा के समान पवित्र हो जाते हैं, उसी प्रकार कर्म प्रारम्भ करने से पहले समस्त कर्म-फलों को मन के द्वारा भगवान को समर्पित करने से समस्त कर्म पवित्र हो जाते हैं। ...
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रवि कान्त शर्मा
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  April 24, 2015, 9:28 am
जीवन में असफलता ही सफलता के शिखर की चाबी होती है। असफलता में व्यक्ति की बुद्धि दिशाहीन हो जाती है, लेकिन जिस व्यक्ति को असफलता में भी दिशा का ज्ञान रहता है वही व्यक्ति सफलता के शिखर को प्राप्त कर पाता है।...
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रवि कान्त शर्मा
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  February 6, 2015, 8:44 am
स्वयं को मचिस की तीली न बनाना, जो जरा सी रगड़ से सुलग जाये।बनाना है तो स्वयं को शान्त सरोवर बनाना, जिसमें कोई अंगारा भी फैंके तो वह खुद ही बुझ जाये॥...
अमृत-वाणी...
रवि कान्त शर्मा
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  January 22, 2015, 10:07 am
सच्चे मन से की जाने वाली आत्मग्लानि उस अग्नि के समान होती है जिसमें बड़े से बड़े पाप भी जलकर भस्म हो जाते हैं।...
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रवि कान्त शर्मा
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  December 20, 2014, 9:32 am
प्राप्त वस्तुओं से अधिक प्राप्त करने की लालसा "लोभ"कहलाती है, "लोभ"त्यागने के पश्चात ही व्यक्ति का अमीर बन पाना संभव होता है।...
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रवि कान्त शर्मा
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  December 13, 2014, 11:22 am
सामर्थ्यवान होते हुए दूसरों की गल्तियों को क्षमा करने पर ही महापुरुषों की श्रेणी में स्थित हो पाना संभव होता है। ...
अमृत-वाणी...
रवि कान्त शर्मा
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  December 2, 2014, 7:49 am
संत की पहिचान सांसारिक और आध्यात्मिक दो दृष्टिकोणों से होती है।जो व्यक्ति स्वयं कष्ट झेलकर दूसरों को सुख देने का निरन्तर प्रयत्न करता है, ऎसे व्यक्ति की पहिचान सांसारिक दृष्टिकोण से संत रूप में होती है।जिस व्यक्ति की समस्त कामनायें परमात्मा का स्पर्श प्राप्तकर शा...
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रवि कान्त शर्मा
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  November 18, 2014, 7:13 am
मनुष्य कर्म करने मे सदैव स्वतंत्र होता है, जो व्यक्ति किसी के कर्म में हस्तक्षेप नहीं करते हैं, और किसी के हस्तक्षेप करने पर विचलित नहीं होते हैं, ऎसे व्यक्ति बुद्धिमानों में श्रेष्ठ होते हैं।...
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रवि कान्त शर्मा
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  November 15, 2014, 7:28 am
अपने कर्तव्यों का ज्ञान न होने के कारण मनुष्य अधर्म के पथ पर ही चलता है।मनुष्य के जीवन में जब-जब वस्तुओं का महत्व बढ़ने लगता है, तब-तब संबन्धों का महत्व कम होने लगता है, और जब संबन्धों पर वस्तुओं का महत्व अधिक हो जाता है, तभी मनुष्य अपने कर्तव्यों से विमुख होकर अधर्म के पथ ...
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रवि कान्त शर्मा
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  October 6, 2014, 8:37 am
प्रसन्नता पूर्वक अपमान सहन करने से और निरन्तर नम्रता धारण करने से मिथ्या अहंकार का मिटना संभव होता है।...
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रवि कान्त शर्मा
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  September 18, 2014, 7:32 am
हम जिनको अपने साथ समझते हैं वास्तव में वह हमारे साथ नहीं होते हैं, हमारे साथ केवल वही होते हैं जिनका हम स्मरण करते हैं।...
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रवि कान्त शर्मा
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  August 8, 2014, 9:40 am
किसी को भी अपना बनाना असंभव है, लेकिन किसी का हो जाना संभव है। जो व्यक्ति किसी एक का भी हो जाता है वह सभी का मित्र बन जाता है और जो सभी का मित्र होता है वही भगवान का भक्त होता है।...
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रवि कान्त शर्मा
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  August 4, 2014, 7:13 am
मित्र की खुशी को स्वयं की खुशी समझना ही मित्र-धर्म कहलाता है, इस धर्म को मानने वाले का संसार में कोई शत्रु नहीं होता है। ...
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रवि कान्त शर्मा
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  August 3, 2014, 9:51 am
"उदारता"जल से भी अधिक तरल होती है। जल की तरलता से समस्त प्राणियों को शीतलता प्राप्त होती है लेकिन मनुष्यों की उदारता से तो समस्त संसार को शीतलता प्राप्त होती है।  ...
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रवि कान्त शर्मा
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  July 20, 2014, 8:53 am
क्रोध, अग्नि से भी अधिक ज्वलनशील होता है, अग्नि तो निर्जीव शरीर को भष्म करती है लेकिन क्रोध तो सजीव चरित्र को ही नष्ट कर देता है।...
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रवि कान्त शर्मा
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  July 18, 2014, 12:10 pm
प्राप्त वस्तुओं को भगवान का प्रसाद और अप्राप्त वस्तुओं को भगवान की कृपा समझने वाला व्यक्ति शीघ्र ही जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है। ...
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रवि कान्त शर्मा
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  July 16, 2014, 9:37 am
पद की प्राप्ति सुख को पाने का माध्यम नहीं होता है बल्कि कर्तव्य का निर्वाह करना होता है।जो व्यक्ति अपने पद का निर्वाह कर्तव्य समझकर करता है तो उस व्यक्ति के जीवन में सुख का कभी अभाव नहीं होता है। ...
अमृत-वाणी...
रवि कान्त शर्मा
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  June 30, 2014, 8:33 am
संसार की सबसे बड़ी शक्ति ब्रह्मास्त्र है, जो प्रत्येक मनुष्य को भगवान के द्वारा प्राप्त है, शब्द "ब्रह्म"स्वरूप बांण के समान होते है और मुख "अस्त्र"स्वरूप धनुष के समान होता है।जब-जब व्यक्ति अपनी बांणी का प्रयोग अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिये करता है तब-तब यह ब्रह्मास्त्र उ...
अमृत-वाणी...
रवि कान्त शर्मा
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  June 19, 2014, 7:35 am
सृष्टि के प्रत्येक कार्य में कल्याण ही छिपा होता है। हमारे दुख में स्वयं के सहित अनेकों का सुख छिपा होता है वह सुख तत्काल दिखलाई नहीं देता है, लेकिन विश्वास के साथ धीरज रखने पर कुछ समय के बाद वह सुख प्रकट होने लगता है।  ...
अमृत-वाणी...
रवि कान्त शर्मा
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  May 28, 2014, 6:38 am
जो स्वयं को निमित्त समझकर अपने कर्तव्य-कर्म करने में निरन्तर लगा रहता है वह सभी पाप और पुण्य कर्म के बन्धन से शीघ्र मुक्त हो जाता है। ...
अमृत-वाणी...
रवि कान्त शर्मा
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  May 27, 2014, 8:07 am
कर्म की विधि का ज्ञान न होने के कारण "जीवात्मा"यानि चेतन प्रकृति बार-बार "शरीर"यानि ज़ड़ प्रकृति की सुख-दुख के भंवर में फंसी रहती है। इसलिये व्यक्ति को सतगुरू के शरणागत होकर अपने स्वयं लिये निश्चित की हुई कर्म की विधि को निर्मल मन से जानने की जिज्ञासा करनी चाहिये।...
अमृत-वाणी...
रवि कान्त शर्मा
Tag :
  May 25, 2014, 9:38 am
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