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'माँ जल्दी घर आओ न'जब तुम मुस्कुराती होऔर चमकती है तुम्हारी जुगनू सी आंखेमै बन जाती हूँ दुनिया की सबसे खुशनसीब औरतनिकल आते है पंख मेरे कंधो परतुम्हे बैठा कर अपनी पीठ परमै घुमा लाती हूँ सात समुन्दर पारमेरे घर पहुचते ही दौड़ पड़ती हो तुम मेरी ओरऔर मै कहती हूँ रुको बेटी मुझ...
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  October 18, 2014, 7:46 pm
 रिसती दीवार सीलन से यूँ ही नहीं गिर जाती दीवारें बहुत दिनों तक खुद में हीसमेटती, सहेजती रहती है नमी को संभालती रहती हैं हर कमी को पर जब ये नमी उभर आती है बूँदें बन कर सीली हुई दीवारों पर फिसलती हैं लकीर बनकर किनारों पर तब हमदर्दी की धूप की गर्मी मीठे से लफ़्ज़ों की नर...
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  June 26, 2013, 12:59 am

 रिसती दीवार सीलन से यूँ ही नहीं गिर जाती दीवारें बहुत दिनों तक खुद में हीसमेटती, सहेजती रहती है नमी को संभालती रहती हैं हर कमी को पर जब ये नमी उभर आती है बूँदें बन कर सीली हुई दीवारों पर फिसलती हैं लकीर बनकर किनारों पर तब हमदर्दी की धूप की गर्मी मीठे से ल...
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  June 26, 2013, 12:59 am
ख़ुशी हो साथ, या न होमगर गम ढून्ढ लेता हैमै कितना भी छुपुंमेरी महक ये सूंघ लेता हैचला आता है चुपके सेरुला जाता है जी भर केमेरे कंधे पे सर रखकरये घंटो ऊंघ लेता है- रंजना डीन ...
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  June 26, 2013, 12:57 am
Happy Father's Day Dear Papaपापा को याद करते हुए बचपन की एक याद शेयर कर रही हूँ आप सबसे...बचपन में मैंने खेले खेल खिलौने ढेरहाथी, बन्दर, भालू, मुर्गा, कछुआ और बटेरपापा ने घुटनों पर अपने झुला बहुत झुलायाकंधे पर बैठा कर मुझको सारा जहाँ घुमायाथे पापा के पेट पर बहुत घनेरे बालजब भी देखू आता था ज...
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  June 16, 2013, 12:32 pm
जिंदगी का पलंगजिंदगी का पलंगइतना है तंगकी लेते ही करवटलुढ़क जाती हूँठंडी ज़मीनजब रास नहीं आतीतो खुद को समेटकर सिमट जाती हूँदेखती हूँपलंग के नीचेतो कुछ खोयी हुई पुरानी चीज़ेंपड़ी पाती हूँमेरे जूड़े की स्टिककुछ रंग बिरंगी बिंदियाकुछ टुडे मुड़े ख्वाबबटोर लती हूँऔर ...
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  June 14, 2013, 10:17 am
फिसल कर आसमां की गोद से जब भी गिरी हो तुम न जाने बांह मेरी खुद-ब -खुद क्यों फ़ैल जाती हैं ऐ नन्ही बूँद तू मुझकोमेरी बेटी सी लगती है ज़रा पलकें मै फेरूँ तो वो मुझसे रूठ जाती है - रंजना डीन ...
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  June 7, 2013, 7:30 pm
हर हँसते चेहरे के पीछे टूटा सा एक दिल होता है जी लूँ कुछ पल साथ तुम्हारे सुन लूँ तेरे सारे सुख दुःख कह दूँ तुझसे मन की गाथा ऐ पल थम जा,थोड़ा सा रुक समझ न पाई क्या न भाया कब मैंने तुझको उकसाया कब कह दी कुछ कडवी बातें कब कुछ अनचाहा सा गाया कब सिरहाने आकर तेरे नींद तुम्हार...
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  May 1, 2013, 12:31 am
हर मर्द खड़ा शर्मिंदा है, हर औरत सहमी-सहमी-सीहर और मचा है शोर और ख़बरों की गहमा गहमी सी कन्याओं की पूजा करके हम सभ्य सरीखे दीखते हैंपर वहशीपन का चरम यहाँ, और दिखती है बेरहमी सी...
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  April 21, 2013, 1:30 pm
हर मर्द खड़ा शर्मिंदा है, हर औरत सहमी-सहमी-सीहर और मचा है शोर और ख़बरों की गहमा गहमी सी कन्याओं की पूजा करके हम सभ्य सरीखे दीखते हैंपर वहशीपन का चरम यहाँ, और दिखती है बेरहमी सी...
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  April 21, 2013, 1:30 pm
याद की सियाही याद की गहरी सियाही फिर टपक कर बह रही  है कागजों पर भूली बिसरी बात फिर से कह रही है चुभ रही है निब की पैनी धारइसके तन बदन पर ज़ख्म ये सदियों से सहकर बात अपनी कह रही है                     - रंजना डीन ...
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  April 15, 2013, 10:49 am
सोचती हूँ डूब मरुँ गोमती में बहुत देख ली जिंदगीवही सुबह वही शाम वही रोज़ के तमाम काम  फिर सोचती हूँ गोमती ही क्यों?डूबने के लिए जगहों की कमी है क्या?क्यों न डूब जाऊं बेटी की मासूम आँखों में जन्नत उससे ज्यादा अच्छी और कहा मिलेगी?क्यों न डूब जाऊं उस हर अधूरे काम को पूरा क...
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  April 7, 2013, 6:36 pm
सलीके कौन रखे याद खुराफातों में जिंदगी बीतती हैं चंद मुलाकातों में चाँद भी झाँक न पाया था जिसकी खिड़की में वो मच्छर रोक न पाया कभी भी रातों में...:)...;)...:D...
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  March 29, 2013, 10:05 am
ऐसा रंग बना दे मौला इंसा इंसा नेक दिखे शैतां सारे डूब मरे और दुनिया सारी एक दिखे Happy Holi to all....:)...
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  March 25, 2013, 10:56 am
बचपनमै खोल कर बैठी हूँ बचपन का पिटाराजुगनू हैं ढेरों और एक नन्हा सिताराकुछ फूल हरसिंगार के सूखे पड़े हैंजो बिन फुलाए रह गया, वो एक गुब्बारागुडिया का एक बिस्तर भी था अब याद आयामाचिस पे कपडा बांध कर तकिया बनायापापा ने जब मुझको पलंग ला कर दिया नएक मोटी सी किताब पर गद्दा ल...
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  March 12, 2013, 12:17 am
बचपनमै खोल कर बैठी हूँ बचपन का पिटाराजुगनू हैं ढेरों और एक नन्हा सिताराकुछ फूल हरसिंगार के सूखे पड़े हैंजो बिन फुलाए रह गया, वो एक गुब्बारागुडिया का एक बिस्तर भी था अब याद आयामाचिस पे कपडा बांध कर तकिया बनायापापा ने जब मुझको पलंग ला कर दिया नएक मोटी सी किताब पर गद्दा ल...
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  March 12, 2013, 12:17 am
वक्त गुज़र जाता है......पिछले सन्डे घर के पड़ोस में एक बुज़ुर्ग की डेथ हो गयी। 10 साल बाद उनका वो बेटा भी आया जो पिछले 10 सालों से विदेश में था। वो बुज़ुर्ग पहले अक्सर मेरे पास आया करते थे अपने इस विदेश बसे बेटे को इमेल करवाने के लिए। बड़े प्यार से सोच सोच कर बोलते ये भी लिख दो, व...
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  February 20, 2013, 11:56 am
रोज़ समेटती हूँ बिखरी हुई जिंदगी सुबह उठते ही बुहार करएक जगह इकट्ठा करती हूँ तिनके थोडा पानी भी छिड़क देती हूँ की नमी से शायद थमी रहे कुछ पल  पर उफ़ ये बवंडर इन्हें हमेशा मेरा आँगन ही क्यों दिखता है क्यों घूम फिर कर यही आ जाते हैं और दिन भर की थकी मै फिर से लग जाती हूँ ...
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  February 3, 2013, 10:23 am
आज़ादी संकीर्ण सोच से दंगों से - रोष से स्वार्थी राजनीती से पिछड़ी कुरीति सेकुपोषित बचपन से रिश्वत के अजगर से झूठ से मक्कारी से भूख से लाचारी से बे रोशन रातों से जहरीली घातॊ से गन्दी मानसिकता से टूटती एकता से                  -रंजना डीन  ...
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  January 26, 2013, 5:54 pm
ऐ जिंदगी मै जीना चाहती हूँ तुझे खुल कर ऐ जिंदगी मै जीना चाहती हूँ तुझे खुल कर संवारना चाहती हूँ खुद को अपने तरीके से खिलखिलाना चाहती हूँ दिल खोलकर बिताना चाहती हूँ कुछ पल अपनी मर्ज़ी से देखना चाहती हूँ दुनिया की खूबसूरती महसूस करना चाहती हूँ छत पर उगे चाँद की चांदनी...
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  December 23, 2012, 1:08 pm
वो इन्द्रधनुषकौन कहता है इन्द्रधनुष केवल बारिश के बाद निकलता है जब बूंदों से भरे बादलों के बीच सेसूरज की किरण गुज़रती है मै तो रोज़ देखती हूँ इन्द्रधनुष मेरे कालेज की गेलरी में फैकल्टी रूम के सामने रोज़ उसके मोटे शीशे से गुज़रती धूप बना जाती है इन्द्रधनुष सीमें...
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  December 10, 2012, 11:21 am
सुकून तुझे तलाशते तलाशते सुकून तुझे तलाशते तलाशते बीती जा रही है उम्र पर तुम हमेशा पहुँच से बाहर तुम्हे पाने की चाहत में बदलती गयी जीने का ढंग रख दी हसरतें एक कोने में निभाती गयी हर हालात संभालती रही हर मुश्किल और फिर भी मुस्कुराना नहीं छोड़ा कुछ न सही तो कम से कम मे...
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  December 8, 2012, 12:10 pm
तुम्हारे प्यार में डूबी हुई एक याद हूँ मै तेरी सांसो में शामिल हूँ तभी आबाद हूँ मै मै जब भी टूट कर बिखरी हूँ तुमने थामा है मै तुमसे दूर हूँ फिर भी तुम्हारे साथ हूँ मै ...
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  November 16, 2012, 4:54 pm
सोंधी सी मिटटी के तपे हुए दीपक में सुनहरी लौ आज फिर जगमगाई है रंगोली रंगों की, मनचाहे ढंगों की हर घर की चौखट पर फिर मुस्कुरायी है घनघोर काली सी एक रात पर फिर से नन्हे से दीपक ने जीतकर दिखाई हैमित्रो को, सखियों को, गैरों को अपनों कोछोटो को - बडको को, सबको बधाई है...
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  November 14, 2012, 10:10 am
इस राह पर चलते चलते आओ चलें सबकुछ भूल बाँहों में बाहें डाले कंधे पर सर टिकाये इस लम्बे से रास्ते  पर शायद इस दूरी को तय करते करते दूर हो जाएँ आपस की दूरियां तुम समझ सको मेरी मै समझ सकूँतुम्हारी मजबूरियां यूँ ही थकते संभलते गिरते उठते शायद संभलना और संभालना आ जाये ...
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  November 6, 2012, 3:02 pm
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