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Sudhinama

घर से बाहर कहीं जाना हो तो प्राय: सुबह नौ दस बजे के बाद ही निकलना होता है ! सड़कें इस समय भीड़ से अटी पड़ी होती हैं और लोगों के चेहरों पर जल्दबाजी, तनाव और झुँझलाहट के भाव स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं ! सबको अपने गंतव्य तक पहुँचने की जल्दी होती है ऐसे में किसीका वाहन ज़रा सा किसी...
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Tag :
  May 22, 2012, 1:59 pm
हाथों की लकीरों में ज़िंदगी उसी तरह उलझ गयी है जैसे बहुरंगी स्वेटर बुनते वक्त सारी ऊनें उलझ जाती हैं औरजब तक उन्हें पूरी तरह से सुलझा न लिया जाये एक फंदा भी आगे बुनना असंभव हो जाता है ! भागती दौड़ती सुबह शामों के बीच किसी तरह समय निकाल स्वेटर की उलझी ऊन को तो मैं फिर भी सुलझ...
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Tag :
  May 17, 2012, 11:09 pm
सदियों से प्रतीक्षा में रतद्वार पर टिकी हुई उसकी नज़रें जम सी गयी हैं ! नहीं जानती उन्हें किसका इंतज़ार है और क्यों है बस एक बेचैनी है जो बर्दाश्त के बाहर है ! एक अकथनीय पीड़ा है जो किसीके साथ बाँटी नहीं जा सकती !रोम रोम में बसी एक बाँझ विवशता है जिसका ना कोई निदान है ना ही कोई ...
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Tag :इंतज़ार
  March 4, 2012, 11:42 pm
नन्हा लंगूर डिम्पी अपने कान में उंगली डाले ज़ोर ज़ोर से चीख रहा था ! जिस पेड़ पर उसका घर था उसके नीचे बहुत सारे बच्चे होली के रंगों से रंगे पुते ढोल बजा बजा कर हुड़दंग मचा रहे थे ! कुछ बच्चों के हाथ में कुल्हाड़ी थी तो कुछ के हाथ में धारदार बाँख ! ये सब होली जलाने के लिये लकड़ी जमा ...
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Tag :
  February 25, 2012, 11:19 pm
विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ट योगदान के लिये या अभूतपूर्व मुकाम हासिल करने के लिये सम्मानित किया जाना किसे अच्छा नहीं लगता ! बहुत प्रसन्नता होती है जब आपके कार्यों को और आपकी उपलब्धियों को सराहा जाता है और मान्यता मिलती है ! लेकिन इस प्रक्रिया के लिये भी क्या छोटी बड़ी...
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Tag :राष्ट्रीय पुरस्कार
  December 23, 2011, 1:02 am
रफ्ता-रफ्ता सारे सपने पलकों पर ही सो गये ,कुछ टूटे कुछ आँसू बन कर ग़म का दरिया हो गये !कुछ शब की चूनर के तारे बन नज़रों से दूर हुए ,कुछ घुल कर आहों में पुर नम बादल काले हो गये !कुछ बन कर आँसू कुदरत के शबनम हो कर ढुलक गये ,कुछ रौंदे जाकर पैरों से रेज़ा रेज़ा हो गये !कुछ दरिया से मोती ...
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Tag :गज़ल
  December 14, 2011, 3:21 pm
जाने क्यों आज सारे शब्द चुप हैं ,सपने मूर्छित हैं ,भावनायें विह्वल हैं ,कल्पनाएँ आहत हैं ,गज़लें ग़मगीन हैं ,इच्छाएं घायल हैं ,अधर खामोश हैं ,गीतों के सातों स्वर सो गये हैं और छंद बंद लय ताल सब टूट कर बिखर गये हैं !मेरे अंतर केचिर परिचित निजी कक्ष के नितांत निर्जन, सूने, नीरव, ...
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Tag :
  December 6, 2011, 11:32 pm
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