दादा का चश्मा..दादी का संदूक

प्रश्न कठिन नहीं परन्तु उत्तर देना आसन भी नहीं ..गत रात्रि दफ्तर से घर लौटा तो घर की दीवालें प्रश्न कर हीं बैठीं ....."आज भी अकेले घर आये हो , कहाँ गए वो लोग जो तुम्हरे इर्द-ग्रीद हुआ करते थे? "अन्न्यास इस प्रश्न पर मै आश्चर्यचकित था.सोफे में धस कर बैठना मेरे हताशा का प्रतीत था....
दादा का चश्मा..दादी का संदूक...
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  June 30, 2012, 12:06 pm
आज यही सोच रहा था.. जीवन के कई रंगों को जीने की लत लगी हुई है..क्या भला है क्या बुरा चंचल मन भली भाती जानता है .जन्म से मृत्यु तक अनेकों रंग देखना है.जैसा रंग मिलेगा वैसी कविता का जन्म हो जाएगा मगर यदि मरने के बाद एक कविता लिखने का मौका मिले तो मै क्या लिखूंगा .......इसी सींच में ड...
दादा का चश्मा..दादी का संदूक...
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  September 29, 2011, 8:09 pm
कोई आधार ढूंढे तो मुझे मेरी माँ दिखती है मुझमे संस्कार ढूंढे तो मुझे मेरी माँ दिखती है मेरे चेहरे की हर खुशियाँ मेरे अन्दर का एक इंसा गढ़ा है खुद को खोकर जो मुझे मेरी माँ दिखती है कोई ढूंढे तो क्या ढूंढे इस दुनिया में एक नेमत को बहुत साबित कदम हरदम मुझे म...
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Tag :मेरी माँ
  March 29, 2011, 10:54 am
शांत घर,सिर्फ तुम्हारे जाने से नहीं हुआ तुम तो लक्ष्मी थी...सारा बैभव ले गयी एक सिंदूर पड़ते हीं तुम्हारा गावं बदल गया और बदल गयी तुम्हारी पहचान ..मुझे याद है,तुम्हारे आने पर ,तुम्हारी माँ अकेले जश्न मनाई थी और मेरी माँ चिंतित दिखी थी ..कल वो भी रो पड़ी थी शायद वो तुम्हारे स...
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  March 17, 2011, 1:44 pm
दादा जी को कहते सुना है..."पगडंडियों के रास्ते हमारे गावं में खुशहाली आएगी" .पत्तों से छानते पानी से प्यास बुझाते लोग अपने खेतों में पसीना बहाना जानते हें. अभी भी बैलों को जोतने से पहले जलेबी खिलाया जाता है.बिजली आएगी...बिजली आएगीकहते कहते मेरा बचपन खो गया..अब नए खेप के बच्...
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Tag :पगडण्डी
  November 15, 2010, 7:40 pm
कई दिनों से सोंच रहा था, एक ऐसे ब्लॉग का रचना करूँ जिसमे ...गावं की महक हो ...रिश्तों की गर्माहट हो ...जहाँ हम सभी एकबंधन में बंध जाएँ ...जिसमे लिखे पोस्ट हर इन्सान पर सटीक बैठता हो ...गावं मेरा हो या आपका होगा तो लगभग एक हीं जैसा..दादी मेरी या आपकी,होंगी तो एक हीं जैसी ...ममता से भर...
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  November 9, 2010, 1:31 pm
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