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Dwarka Baheti 'Dwarkesh'

                        धर्म का मर्म कर्म               | यतो अभ्युदयः निश्रेयसः सिध्दि सः धर्मः |ऐसे कर्म करना जिससे लौकार्थिक व पारमार्थिक दोनों के कल्याण की सिध्दि प्राप्त हो, हर मानव का धर्म है |ऐसे कर्म कैसे किये जाय, यह जानने से पहिले कर्...
Dwarka Baheti 'Dwarkesh'...
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  March 10, 2014, 5:24 pm
आधे-अधूरे हर पुरुष,चाहता है,अपनी स्त्री में,अलग-अलग, हजारों नारियों की,एक साथ, विशेषता |हर नारी,  चाहती है,अपने मर्द में,अलग-अलग पुरुषों की,एक साथ,क्षमता |जो नहीं सम्भव,इस जग में,किसी को भी,वो चाहे द्रोपदी हो, या-लीलामयी गोविन्दा |इस जग में,कोई भी नहीं होता है पूर्ण,और ना ही ...
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  October 14, 2013, 11:15 pm
          मूर्तिपूजा का रहस्य  ईश्वर निराकार, निर्गुण, असीम, अनन्त व सर्वज्ञ है एवम् हम साकार, सगुण, ससीम, सान्त व अल्पज्ञ | ऐसी स्थिति में एक साधारण व्यक्ति अपना ईश्वर के साथ कैसे सम्बन्ध स्थापित करे, उसे कैसे समझे और कैसे उस सम्बन्ध को निरन्तर स्मरण रखे ? इस सम...
Dwarka Baheti 'Dwarkesh'...
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  September 26, 2013, 3:39 pm
साम्प्रदायिकता मेरा ईश्वर सबसे श्रेष्ठ,बाकी सबका एकदम निष्कृष्ट !इसका प्रमाण ?आओ आपस में लड़ लें,वाद से, विवाद से,हथियार से, उन्माद से,रक्त की धार से....जो जीतेगा उसका ही,वह,सर्वव्याप्त, सर्व कल्याणकारी,आनन्दमयी, प्रेमस्वरूप ईश्वर,होगा सबसे श्रेष्ठ !!!???...
Dwarka Baheti 'Dwarkesh'...
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  September 23, 2013, 12:09 am
      ज्ञानगधे पर लादे गए नमक सा,जानकारियों के पाण्डित्य का पुलन्दा,जिससे गधा तो अपनी जान छुड़ाना चाहता है,  क्योंकि वह जानता है, कि- यह तो है केवल एक बोझा |लेकिन, जिससे स्वयं को आभूषित समझ,अपने आप को समझदार समझने वाला हर इन्सान,उसे,हीरे-जवाहरात सा दिन-रात ढोता,जिससे वह सदै...
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  April 1, 2013, 3:46 pm
  बहादुर बाला को श्रद्धांजलि तुम अनामिका होकर भी, चर्चित हो हर लब पर,तुम तो मर कर भी, हो गई सदा के लिए अमर,चेता दी आग करोड़ों मुर्दा दिलों मैं, चेतना की एक धधकती मशाल बन कर,तुम तो रहोगी जिन्दा, सदा हमारे दिलों में,हे देवी ! तुम्हें मेरा वन्दन शत-शत |तुम तो शहीद हो गई, मानवता की ब...
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  January 2, 2013, 5:35 pm
  बहादुर बाला को श्रद्धांजलि तुम अनामिका होकर भी, चर्चित हो हर लब पर,तुम तो मर कर भी, हो गई सदा के लिए अमर,चेता दी आग करोड़ों मुर्दा दिलों मैं, चेतना की एक धधकती मशाल बन कर,तुम तो रहोगी जिन्दा, सदा हमारे दिलों में,हे देवी ! तुम्हें मेरा वन्दन शत-शत |तुम तो शहीद हो गई, मानवता की ...
Dwarka Baheti 'Dwarkesh'...
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  January 2, 2013, 5:35 pm
               धर्म                 डॉ. द्वारका बाहेती        धर्म को लेकर इस दुनिया में जितने विवाद व दंगे हुए हैं शायद उतने किसी भी अन्य कारण से नहीं हुए होंगे | सभी मनुष्य अपने संस्कार या पूर्वाग्रह सिद्धान्तों के वशीभूत हो अपने-अपने धर्म को सर्वश्रेष्ट व दूसरे के धर्म को एकद...
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Tag :गद्य
  May 24, 2012, 12:12 am

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Tag :
  December 26, 2011, 11:16 pm
       मनुष्य- शाकाहारी या मांसाहारी ?   प्रकृति में सब कुछ नियमबद्ध है | उसमें जो कुछ भी घटता है उसको  वैज्ञानिक धरातल पर कसा जा सकता है | जब भी कोई उसके विरुद्ध जा उससे छेड़छाड़ करता है तो उसके दुष्परिणाम उसके साथ-साथ अन्य सभी को भी भोगना पड़ते हैं |        मानव, प्रकृति की सबसे प...
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Tag :गद्य
  November 17, 2011, 2:20 pm
       तम्बाकू की विनती मैं अलबेली तम्बाकू, प्यार करूँ गर्दभराज से,आकर्षित, सम्मोहित करती, उनको अपने महक भरे प्यार से |लेकिन उनको तो नफरत है, मेरी रंगत, खुशबू तक से,अतः जलभुन कर बनी विष-बाला, इर्षा, द्वेष, जलन, मत्सर से |पर मनुज दीवाना मुझ पर मरता, पागल, मतवाला हो कर,मजनूं सा पा...
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Tag :भाव-रस
  November 4, 2011, 11:40 pm
 नज़र के नज़रिये नज़र-नज़र है, बड़ी अजब है |अखबार सी जिसमें, कई खबर है |नज़र के मटके, लटके, झटके |नज़र के तेवर, बड़े गजब है |नज़र महोब्बत,नज़र है नफ़रत | नज़र वफ़ा है, नज़र दगा है |नज़रप्यास है, नज़र जाम है |नज़र शराबी, नज़र है साकी |नज़र होंश है, नज़र नशा है |नज़र आग है, नज़र आब है |नज़र बेरहम, नज़र दया है |    नज़र ...
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Tag :शृंगार रस
  September 20, 2011, 11:40 pm
   अमृत- क्षण पनघट जाने निकली राधा,जिसका था अल्हड़ यौवन |साथ लिए अपनी मटकी,अपनी मस्ती, अपनी ही धुन |अस्त-व्यस्त सब चुनरी-चोली,आँचल उसका मचल रहा |बिखरे बाल घनघोर घटा से,मुखडा जैसे उसका चंदा  |मदमाती सी चली जा रही,वह दुनियाँ से बेखबर |गदराये अपने यौवन से,अन्जान, अनभिज्ञ वह ...
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  August 2, 2011, 12:59 am
    सफल – जीवन            १  सोचते ही रहते हैं, क्या करें, कैसे करें ?कौन सी राह चल, यह जीवन सफल करें ?कोई भी एक राह ले, चलें अडिग यदि अनवरत |मिल ही जायेगी मंजिल, होगा यह जीवन सफल |                २ फूटी हुई बाल्टी में भरा जीवन,निकलते ही जा रह...
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  August 2, 2011, 12:43 am
 क्या यही प्यार है जिन्दगी की धुवांधार बारिश में,कमल पर पड़ी ओस की बूंद सा,एक अहसास,क्या यही है प्यार......?जिन्दगी के काँटों के बिछोने में,फूलों की पखुडियों सा,एक अहसास,क्या यही है प्यार........?जिन्दगी के साफ-सुथरे मरुस्थल में,गुलाबों से महकते गुलिस्ताँ सा,एक अहसास,क्या यही है ...
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Tag :शृंगार रस
  July 27, 2011, 5:11 pm
      पूर्णांगिनी मैं अधूरा सा भटकता फिर रहा था,एक भ्रमर सा |कभी एक तो कभी दूसरे,रंग-बिरंगे फूल पर,मचलता था मन मेरा |कभी एक तो कभी दूसरी,खुशबू लुभाती थी मुझे |मैं असमंजस में पड़ा,यों ही भटकता फिर रहा था,बस अधूरा |फिर मिली तुम,और वे रंग-सौरभ,जिन्हें मैं,खोजता फिर रहा था,सब तुममे...
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Tag :शृंगार रस
  July 3, 2011, 11:01 pm
मानवता जिन्दा है जंगल कट रहे हैं,हरियाली घट रही है,मरुस्थल बढ़ रहे हैं,फूल फिर भी खिलते हैं,बहारें फिर भी आती हैं |गंदगी बढ़ रही है,बदबू फ़ैल रही है,प्रदूषण के बादल छ रहे हैं |सूरज व चाँद फिर भी उगते हैं,मेघ फिर भी आते हैं,आसमां में छाते हैं,खुशहाली बरसते हैं |लूट-खसोट, मारकाट,ह...
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Tag :
  June 12, 2011, 10:40 pm
          मेरा भारत महान  जब तक दावानल सी बढ़ती, जानलेवा भूख,और अकाल में सूखी धरती सी, प्यास बनी रहेगी |जब तक ठण्ड सा ठिठुरता, गरीब का नंगापन,और बाढ़ की तरह फैलता, आतंकवाद रहेगा |जब तक टीवी पर विज्ञापनों की तरह, बढ़ती बेरोजगारी,और भूकम्प की तरह निगल जाने वाली, बीमारियाँ रहेंगी |जब...
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Tag :हास्य-व्यंग्य
  May 1, 2011, 7:35 pm
       संस्कारित-पौधा बच्चा होता, जैसे छोटा कोमल पौधा |बढ़ता अपनी ही मस्ती में, अपनी ही वह धुन में होता | लेकिन जग को नहीं पसंद, उसकी मस्ती उसकी धुन |उसे उसकी जग-जननी से उखाड़,रोपा सामाजिक गमले में,अपने-अपने मज़हब की मिट्टी डाल |फिर जैसे-जैसे बड़ा हुआ,शुरू हुआ उसको देना एक विशेष आक...
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Tag :
  April 26, 2011, 3:50 pm
 भावों का दर्पण    छुपा लो चाहे जितना मन में,छुपा नहीं पाता है चेहरा |दिल का हाल बता देता है,भावों का दर्पण है चेहरा |शांत, गंभीर जो होता चेहरा,सागर सा लगता है गहरा |भावनाओं से नयनों में, तब –प्यार सा उमड़े तूफां गहरा |उलझा माथा रेखाओं में,सिकुड़ापन चिंता बतलाती |गुस्से सी भौह...
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Tag :भाव-रस
  March 22, 2011, 3:34 pm
    शादीशादी,दो दिलों का सम्बन्ध,आत्माओं का मिलन,प्यार के धागों का बन्धन,न शिकवा, न शिकायत, न कोई प्रश्न,यह तो है बस पूर्ण समर्पण |या फिर,आधिपत्य, अधिकार,लेन-देन, एक व्यापर |मार-पीट, जीत-हार,झगड़ा-फसाद, एक तकरार ?या,बस एक समझौता ?या, किसी भी खूंटे से बाँधा हुआ,एक सामाजिक बन्धन ?...
Dwarka Baheti 'Dwarkesh'...
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  March 22, 2011, 3:25 pm
 होली पर प्रेमी-प्रेमिका की छेड़छाड़प्रेयसी –पिचकारी से रंगन की, काहे बौछार करत|कचनारी अंगन पे, मोहे है मार पड़त |भीग गई चुनरिया, लाज से मैं हूँ मरत |कजरारे नयन बची, काहे मोरी लाज हरत ?सर-सर-सर, सर-सर-सर, स र र र र, स र र र र,सर-सर-सर, सर-सर-सर, स र र र र ,स र र र र |प्रेमी – होली के रंगन में, ...
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Tag :हास्य-व्यंग्य
  March 18, 2011, 3:41 pm
        नौटंकी दुनिया –  कठपुतली जीवनदौड़ा-भागी ,आपा-धापी ,रेलम-पेल ,धक्कम-धक्का |धमा-चौकड़ी ,हाथा-पाई ,भागम-भाग ,भीड़-भडक्का |तू-तू ,मैं-मैं ,बक-बक ,झक-झक ,उठा-पटक ,लटका-झटका |कूद-फांद ,धींगा-मस्ती ,अफरा-तफरी ,धक्का-मुक्का |छिना-झपटी ,मारा-मारी ,उछल-कूद ,धूम-धड़क्का |हडबड नौटंकी दुनिया ...
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Tag :हास्य-व्यंग्य
  March 14, 2011, 4:04 pm
   तीन तरह के आदमी इस दुनिया में होते हैं, तीन तरह के आदमी,एक ‘उ’ उल्लू की मात्रावाला ‘बुद्धू’, पागल, विक्षिप्त |जिसे सुख-दुख, जीत-हार, लाभ-हानि, कुछ समझ नहीं आता,इसीलिए वह हर हाल में, अपने को मस्त पाता |दूसरा वह जो ‘बुद्धू’ से ‘उ’ उल्लू की मात्रा को,अपने विवेक से हटा ‘बुद्ध’ ह...
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  March 14, 2011, 3:56 pm
बहुरंगीजीवन मधुशाला १ मदिरालय बनने को कब से ,सारा जग है मतवाला |ऊपर छत नीले अम्बर की ,जड़ित चाँद ,मंडल-तारा |नीचे आँगन हरित अवनी का ,पर्वत,सागर,नदिया-धारा |रंग-बिरंगे फूलों से सजी ,प्यारी-प्यारी मधुशाला |२यह सुन्दर सुघड़ बदन मेरा ,बस इक पीने का प्याला |लयबद्ध प्राण जो बहते ,वही...
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Tag :जीवन मधुशाला
  February 23, 2011, 11:09 pm
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