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विवाह एक महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था है जिसका उद्देश्य व्यक्ति को जैविक और सामाजिक पूर्णता प्रदान कर समाज की निरंतरता बनाये रखने के मान्यविधान को गतिशील रखना है |विभिन्न भाषाओं  ,संस्कृति और जातीय वैशिष्ट्य के आधार पर विवाह के अनेक स्वरूप और रीतियाँ प्रचलित हैं लेक...
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  July 28, 2014, 6:05 pm
दौलतमंद लोग दिलदार भी हों ऐसा कतई जरुरी नहीं है ,लेकिन असली दौलतमंद वही होते हैं जिनके पास दिल की दौलत होती है |क्योंकि दौलत तो तिकड़म करके भी हासिल हो सकती है लेकिन दिलदारी संस्कारों से ही मिलती है |दौलत यों तो हरेक की चाहत और जरुरत है लेकिन दौलतमंदों में दौलत की ख्वाहिश ...
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  February 24, 2014, 4:43 pm
बाराती का नाम जेहन में आते ही शरीर में सिहरन-सी दौड़ जाती है |बाराती की अपनी ही निराली शान होती है |जैसे वसंत ऋतू में युवा-बूढ़े सबकी आँखों में एक गुलाबी खुमार होता है और मन में उल्लास की नदी अपने तटों को तोड़ती बहती है वैसी ही मनोदशा एक बाराती की होती है |उसकी शान और ठाठबाट का...
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  February 18, 2014, 11:18 pm
विज्ञानवेत्ता या विज्ञानविद सामान्यतः वे लोग कहलाते हैं जो विज्ञान की गहरी जानकारी रखते हैं या विज्ञान के अंतर्गत किसी विषय का विशद अनुप्रयोगात्मक ज्ञान रखते हैं |हालाँकि हर विज्ञानविद को विज्ञान की अपनी समझ को दैनंदिन व्यवहार में अपनाना चाहिए लेकिन दुर्भाग्यवश ...
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  October 28, 2013, 3:22 pm
सपने सभी देखते हैं ,आम भी और खास भी |कुछ खुली आँखों से सपने देखते हैं और कुछ  बंद आँखों से |सपनों की अपनी दुनियां है ,सजीली और नयनाभिराम |महात्मा गाँधी ने भी एक सपना देखा था |एक ऐसे आत्मनिर्भर और शोषणमुक्त भारत का सपना ,जिसमें समाज के निचले पायदान पर खड़े अंतिम व्यक्ति को ...
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  October 24, 2013, 12:07 pm
सलूनो ,भुजरिया और चांदमारी के इस त्रिकोण का सामाजिक ,सांस्कृतिक और आर्थिक  महत्व है |सलूनो या रक्षाबंधन का महात्म्य तो सर्वविदित है |इसके आयोजन के उद्देश्य का निरूपण करने वाली अनेक लोक कथाएं प्रचलित हैं ,जिनमें पाठभेद और कथाभेद दोनों मिलता है |लेकिन कलेवर विस्तार के ...
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Tag :सलूनों
  October 20, 2013, 6:29 am
चार राज्यों में चुनावी बिगुल बजने के साथ ही सियासी हलचलों का दौर शुरू हो गया |चुनाव जो लोकतंत्र का महापर्व है,कुछ लोगों के लिए उत्सव जैसा है |चुनाव से जुड़े कारोबारियों के चेहरे खिल गए हैं और जिन  सैंकड़ों लोगों का बिना मेहनत की रोटी का जुगाड़ हो गया है ,उनकी वाछें खिल उ...
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Tag :चुनाव
  October 19, 2013, 8:38 am
भ्रष्टाचार बढ़ रहा यों ,ज्यों सुरसा का विस्तार |नेताओं की  माया से  भगवान  भी  गया  हार ||अग्निमुखी,कलियुगी देव सब चट कर जाते हैं |बड़े  चाव  से  चारा  और  कोयला  खाते   हैं  ||बेशर्मी  भी  इन  बेशर्मों  से  शरमाती   है   |हिन्स्रपशु से भी निकृष्ट ध...
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Tag :भ्रष्टाचार
  October 18, 2013, 9:51 pm
चालीस-आठ  लाशों  के  ऊँचे  ढेर पर |कुछ तो बोलो ,इस प्रायोजित अंधेर पर ||भाजपा, सपा, बसपा  सारे  हैं  मौन   |है  धुला  दूध  का  बोलो  इनमें  कौन ||सेंके  सबने  इस  दावानल  में  हाथ  |है  दिया  आततायी  लोगों  का साथ ||सबने मिल  रौंदी  भाईचारे की छ...
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  September 12, 2013, 12:03 pm
नफरत की विषबेल ये ,यहाँ किसने आकर बोई |लहू बहा है किसका ,देख बता सकता क्या कोई ?छोटी-छोटी बातों को ,फिर तूल दे रहे लोग    |यह सोची-समझी साजिश है,नहीं महज संयोग ||सिर पर देख चुनाव ,सियासी लोग चल गए चाल |जाति,धर्म की चिंगारी ,दी जानबूझ कर डाल  ||कितने मासूमों ने अपने अभिभावक खोय...
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  September 11, 2013, 9:12 pm
जैन-जाग्रति के पुरस्कर्ताओं की पंक्ति में एक उल्लेखनीय नाम स्यादवादवारिधि,वादीगजकेशर,न्यायवाचस्पति,गुरुवर्य पंडित गोपालदास वरैया का है |पंडित जी का जन्म विक्रम संवत १९२३ में आगरा में श्री लक्ष्मण दास जी जैन के घर हुआ था |आपके पिता की आर्थिक स्थिति बहुत सामान्य थी |ज...
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  August 8, 2012, 10:49 pm
बीन बजी ,फिर खुला पिटारादेखें,किसके हैं पौ -बारह /किसने खायी दूध-मलाईदिन दूनी और रात चौगुनी ,किसने करी कमाई भाई /किसने पहनी हैं मालाएं नोटों की ,किसके चर्चे हैंकिसने स्टेचू बनवाकर ,जनता के पैसे खर्चे हैं /भरमा रहा कौन जनता को ,कौन कर रहा झूठे वादेआस्तीन में सांप छिपाएकिसक...
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  January 13, 2012, 10:23 pm
दर्शन या दर्शनशास्त्र से सामान्य तात्पर्य है ,जीवन और जगत के मूल उत्स के बारे में सैद्धांतिक विमर्श |इस विमर्श में जीवन को उन्नत बनाने के उपाय खोजना भी शामिल है |लेकिन प्रायः हमारा आग्रह जीवन के भौतिक पक्ष पर कम और उसके अपार्थिव और लोकोत्तर पक्ष पर ज्यादा रहा है |इस कार...
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Tag :दर्शनशास्त्र : एक दृष्टिपात
  December 12, 2011, 11:17 pm
कृष्ण भारतीय पुराकथाओं के एक विशिष्ट नायक हैं |कृष्ण और कंस के संघर्ष की कथा सबको विदित ही है |इस संघर्ष की महागाथा को सात्विक और तामसिक वृत्तियों के संघर्ष के रूप में चित्रित किया जाता है |किन्तु मेरे विचारानुसार कृष्ण और कंस मातृसत्ता और पितृसत्ता के प्रतिनिधि हैं औ...
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Tag :कृष्ण और कंस का संघर्ष
  December 10, 2011, 11:16 pm
व्यक्ति जन्म से लेकर मृत्यु तक ,बचपन से लेकर बुढ़ापे तक पराश्रित रहता है और यह परावलंबन उसके स्वभाव में गहरे पैठ जाता है |बचपन में तो वह अपने माता-पिता और परिजनों के आश्रय में रहता है और किशोरावस्था में अपने बाल- सखाओं और मित्रों के सानिध्य में रहता है |युवावस्था में जब व...
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Tag :आत्मावलंबन
  December 8, 2011, 10:08 pm
बूढ़े लोग सामान्यतः अनुवभ-दम्भी होते हैं |अपने जीवन भर के संचित अनुभवों की गठरी का भारी बोझ अकेले ढोना उनके लिए कष्टदायक होता है इसलिए वे इष्ट जनों के साथ अपने इन अनुभवों को बाँट कर सहनीय सीमा तक हल्का कर लेना चाहते हैं |इस मामले में उनकी सबसे ज्यादा अपेक्षा परिजनों से ...
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  December 5, 2011, 9:21 pm
क्या जाने वह ,भला भूख की आग कभी भाग्य का छल कर ,कभी बाहुबल से हड़पा हो जिसने औरों का भाग |यह नहीं विधाता का कोई अभिशाप ,दंड जिंदा  शैतानों के हाथों का खेल है ;यह है  अमोघ उपकार सेठ ,श्रीमंतों का उनकी रोपी, पोषी,रक्षित विषवेल है |शस्त्रों,शास्त्रों के बल पर न्यायोचि...
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  October 22, 2011, 7:21 am
लहार के विषय में किम्वदंती है यह स्थान महाभारत में वर्णित लाक्षागृह रहा है तथा लाख की तीव्र गंध वातावरण में व्याप्त रहने के कारण यह कालांतर में लहार नाम से जाना गया |क्योंकि लहार शब्द का अर्थ ही स्थानीय बोली में तीव्र गंध है और इस अर्थ में यह शब्द यहाँ आज भी प्रचलित है |ल...
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  October 4, 2011, 4:58 pm
आधार बना सहजीवन को ,निज अनुशासन में बद्ध रहें /कर्तव्यों के परिपालन में ,नित सजग और सन्नद्ध रहें /वंदन उनका, जिन्हने जग कोसामाजिक न्याय सिखाया है /कथनी- करनी में भेद न कर ,भद्रोचित मार्ग दिखाया है /जो मूल्य मील के पत्थर हैं ,उनका जीवन में वरण करें /वैज्ञानिक सोच-समझ रक्खें ,...
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  October 3, 2011, 7:13 am
कंक्रीट के जंगल उभरे ,बढ़ी यहाँ अनियंत्रित भीड़बदन हुआ धरती का नंगा ,कहाँ बनायें पक्षी नीड़चीरहरण होना धरती का हुई आज साधारण बातअपनी वज्रदेह पर फिर भी सहती वह कितने संघातइतने उत्पीड़न ;सहकर भी जो करती अनगिन उपकारउसके ही सपूत उससे करते ऐसा गर्हित व्यवहारदोहन पर ही हम...
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  September 13, 2011, 8:59 am
तुम साकार आस्था हो,अभिनंदनीय होधरती के बेटे किसान तुम वंदनीय हो/बीज नहीं तुम खेतों में जीवन बोते होभैरव श्रम से कभी नहीं विचलित होते हो/वज्र कठोर,पुष्प से कोमल हो स्वभाव सेहंसकर विष भी पी जाते हो सहज भाव से/तुमने इस जग पर कितना उपकार किया हैबीहड़ बंजर धरती का श्रृंगार क...
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  September 11, 2011, 7:24 am
जब बदला नहीं समाज,राम की चरित कथाओं से /बदलेगा फिर बोलो कैसे गीतों,कविताओं से   / /जो गिरवी रखकर कलम ,जोड़ते दौलत से यारी/वे खाक करेंगे आम आदमी की पहरेदारी  / /जब तक शब्दों के साथ कर्म का योग नहीं होता/थोथे शब्दों का तब तक कुछ उपयोग नहीं होता//            .व्यवहारपू...
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  September 10, 2011, 6:10 am
 नंदन-वन !यों है कहने को नंदन वनपल्लवित वृक्ष दो चार ,शेष भूखे नंगे बच्चों-से क्षुप |श्रीहीन,दीन बालाओं-सी मुरझायीं बेलें भी हैं कुछ |जिस ओर विहंग-दृष्टी डालो अधसूखे ठूंठ हजार खड़े |उपवन, उद्यान कहो कुछ भीदर्शन थोड़े,बस नाम बड़े |यों है कहने को नंदन !------श्रीश राकेश ...
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  September 9, 2011, 7:33 am

जिन्होंने उगाये नहीं वृक्षवे क्या जाने माली की व्यथाअनगिनत वर्षों की कड़ी तपस्यानिरंतर धूप में झुलसने की पीड़ाछाँव में बैठने की इच्छा आकांक्षा/वे क्या जाने?बीज की टूटन,स्फुटन,पुनर्जन्म की कथा;खुद के मर जाने की व्यथा/वे क्या जाने?जिन्होंने उगाये नहीं वृक्ष।-डा.श्याम व...
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  July 21, 2011, 10:55 am
जैसे-जैसे देश का आर्थिक संकट गहराता जा रहा है और समाज कि तमाम संस्थाओं को लाभ का लोभ ग्रस कर भ्रष्ट कर रहा है ,वैसे-वैसे ही देश और समाज के शासक समुदाय को इस तथ्य का गहराई से बोध होता जा रहा है कि वह स्थापित मानदंडों ,मूल्यों तथा विधि द्वारा अपनी सत्ता तथा नायकत्व को दीर्घक...
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  November 16, 2010, 7:49 am
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