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सावन में अब फुहारें नहीं पड़ती न हरी चूड़ियों की खनखनाहट सुनाई देती है। हरियाली तीज अब हरियाली को तरसती है ,शादी के बाद पहला सावन मायके के होता था ,सावन होता था बेटियों का त्यौहार मैके से विदा नहीं होती थीं माँ की देहरी पर  सखी सहेलियों के साथ हरी चूड़िय...
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  July 1, 2017, 8:26 am
खुलेआसमान मेंविहान से उड़ते रहोपतंगमत बनना कभी।वो पतंगजोडोर दूसरों को देकरआसमान मेंनचाई जाती है ,न मर्जी  से उड़ती हैऔर न मर्जी से उतरती है।हाँ वहकाट जरूर दी जाती है ,और बेघर सीकहीं से कटकरकहीं और जाकरजमीं मिलती है उसे।अपने पैरों कोउन्मुक्त आकाश मेंफैलाये हुएअपने अ...
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  January 23, 2017, 2:38 pm
 प्रकृति क्रुद्धफटते हैं बादलदरकती है भूतड़ित छूने लगीआसमाँ से जमीं कोपरइति तो हमारी हैमानव की हैदण्ड  ही तो हैहमारे कर्मों का भोगते तो वे हैं ,जिनका कोई दोष नहीं।मेहनतकश है जो ,खेतों में बैठे थे ,घनघोर बारिश मेंशरण लिए थेपेड़ के नीचे। अबोध बीन  रहे थेआम बगीचे में...
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  July 15, 2016, 3:52 pm
बन सको तो दीपक की मानिंद बनो ,जग रोशन कर जाता है ,खुद जल कर ही सही ,उसका नाम बन चुका है उजाले का पर्याय। कितने दीप बचते हैं जहाँ में ?फिर भी दीप नाम अमर ही तो है।  कौन  जानता है माटी , बाती और तेल को,कुछ भी तो नहीं है सब का संयोग ही कहें  या कहें संगठन कहें ...
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  June 29, 2016, 12:43 pm
बहुत याद आते हो तुम रोने को जब दिल करता  है ,पापा ऐसा क्यों लगता है ,साथ हमारे आज भी हो। अपनी छाया में रखते थे ,अलग कभी भी नहीं किया ,साया बन कर साथ चले थे ,साथ हमारे आज भी हो। कलम मैंने पकड़ी थी दिशा उसे तुमने ही दिखलाई ,मेरे  शब्दों में अहसास बन, साथ हमारे आज भी हो। अपन...
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  June 19, 2016, 12:30 pm
बेटातारणहारकुल दीपकऔर न जाने क्या क्या ?वर्षों पहलेनिकाला था घर से ,भटकते रहे दर-ब-दरपनाह दी किसी अनाथ ने ।अपने अनाथ होने के दुख कोभूल जाने के लिए ,बहुत प्यार दिया ,बहुत आशीष लिया ।इक दिन चल दियेतोबेटे को खबर दी ,आया और संगत में बैठा रहा ।कांधे औरों ने दियेबाप की आत्माबार...
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  June 10, 2016, 3:43 pm
कभी कभी सामने से ऐसा गुजर जाता है कि न रोना आता है और न कुछ कर पाते हैं।  ऐसी देखी एक दिन बेबसी और फिर ये कविता रची।स्वेद बिंदु है चमकती माथे पर ,सिर पर लादे बोझ गड़ा गड़ा कर रखती हर कदम गिर कहीं गया तो रोटी भी नसीब न होगी। बच्चों की खातिर जुटी हैंधूप  से जलत...
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  June 7, 2016, 1:21 pm
कुछ धुँधली सी यादों पर जब पड़ जाती है उजली सी तस्वीरों का चमकता हुआ सूरज। फिर क्यों ?वापस हम जीने लगते हैं अतीत के उन पीले होते हुए पन्नों को। कुछ मधुर कुछ तिक्त कुछ कटु सब गुजरे  हुए पल फिर से जीने के लिए उन तस्वीरों में घुस जाऊं। उन पलों को ...
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  March 10, 2016, 1:10 pm
मेरी डायरियां मेरी संवेदनाओं की साक्षी ,बचपन से अब तक की साथी ,उम्र के साथ उनकी उम्र नहीं उनकी संख्या बढ़ती गयी। इनकी कीमत मेरे सिवा  कोई समझ नहीं सकता। इस घर में, मैं अपनी थाती सीने से लगा कर लाई थी। मुझे मोह नहीं था कोई मेरे कपडे ले ले कोई गहने भी ले ...
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  October 12, 2015, 7:34 pm
हाँ मैं रिश्ते बोती हूँ , धरती पर उन्हें रोपकर निश्छल प्यार ,निस्वार्थ भाव,और अपनेपन की खाद - पानी देकर उनको पालती हूँ। धूप , पानी और शीत से कभी बहा कर पसीना कभी देकर सहारा कभी पौंछ कर आंसू उन्हीं के लगाकर काँधे समेत कर सिसकियाँ बेटी , बहन और बहू के र...
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  September 18, 2015, 9:10 pm
अपनी इस कविता को मैंने जानबूझ कर हिंदी दिवस पर नहीं डाला क्योंकि हिंदी हमारे लिए सिर्फ एक दिन अलख जगा कर चिल्लाने की चीज नहीं है।  उसके लिए प्रयागत्नशील हमारे साथियों के प्रयासों में एक निवेदन ये भी समझा जाय।क्या हम गुनहगार नहीं ?मुख से जो फूटा था शब्द प्रथम - वो 'म...
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  September 16, 2015, 8:17 pm
'म 'इस शब्द का कितना गहरा रिश्ता है ?हर इंसान से खासतौर पर हर औरत से। 'म'से 'मैं'''म'से 'मेरी /मेरा ''म'से 'माँ''म'से 'मायका 'एक कहावत है न ,माँ से मायका। .पता नहीं कितना सोचकरकितने अहसासों के बदलेकितने आहत मनों नेइसको गढ़ा होगा।कभी गुजरते हुए  सड़क परजाती हुई बसों परदेखकर 'मायके के ...
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  June 22, 2015, 1:32 pm
आज निकले मन की तराजू लेकरतौलने वजन रिश्तों का ।हमने तो जीवन भर दिया सबको अंतर मन से वांछित ,पर शाम तक लौटने के समय तक कोई मुझे वक्त ही न दे पाया तौलती मैं क्या ?सजे हुए घर मेज पर लगे नाश्ते की प्लेटें या हाथ बांधे खडी उनके कामगरों की फौज ।खाली तराजू ,भरा मन औ'रिक्तता का अहसा...
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  June 19, 2015, 4:29 pm

जीवन में       लोगों के लिए ,     ये तीनों महान आत्माएं       प्रश्नों के उत्तर लेकर   फिर से आयीं हैं। कलयुग में उठ रहे प्रश्नों को लेकर अपने चरित्र पर उछलते कीचड से बचाने को अपने अस्तित्व को खुद आये हैं। ये तीनों राम , सीता और लक्ष्मण ...
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  May 6, 2015, 3:26 pm
!जीवन में       लोगों के लिए ,     ये तीनों महान आत्माएं       प्रश्नों के उत्तर लेकर   फिर से आयीं हैं। कलयुग में उठ रहे प्रश्नों को लेकर अपने चरित्र पर उछलते कीचड से बचाने को अपने अस्तित्व को खुद आये हैं। ये तीनों राम , सीता और लक्ष्मण ...
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  May 6, 2015, 3:26 pm
मैं धरतीमैं पृथ्वीमैं धरा कही जाती हूँ।मैं जीवनमैं घर द्वारमैं सरिता ,जंगल -वन , पर्वत, सदियों से धारे हूँ।सदियों से सब जीव मुझसे जीवन लेकरजीते , फलते और फूलते आ रहे हैं,मेरी संतति कहे जाते हैं।जब तक माँ समझा मुझकोमान और सम्मान दिया ,मैं मान संतति तुम सबकोपाल रही थी, पाल ...
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  April 22, 2015, 5:16 pm
प्रेम वह पवित्र भाव ,जिसमें सिर्फ और सिर्फ निर्मल, निश्छल और निष्पाप आत्मा का समावेश है,कहीं कोई तृष्णा , चाह या स्वार्थ नहीं, आत्मा से आत्मा का मिलन ही प्रेम है। ये जरूरी तो नहीं कि रुक्मणी का प्रेम राधा सा प्रेम हो ,गोपियों का प्रेम सत्यभामा सा अधिकार च...
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  April 15, 2015, 9:17 pm
 सरिता तीरेधीरे धीरेमंद प्रवाहितसुखद समीरे ,लहरें थामें अपनाआँचलसाक्षी हैंये लहरें औ'जल।जीवन क्रम भी उदित सूर्यतप्त सूर्यया फिरशांत रक्तवर्ण सूर्य सेजुड़ा जो रहता है। ये सरिताअपने जल में जीवन के हर आश्रम कोचाहे वोब्रह्मचर्य , गृहस्थ ,वानप्रस्थ और संन्यास होंहर ...
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  April 2, 2015, 5:39 pm
रिश्ते बनते हैं बिगड़ते हैं और और फिर ख़त्म हो जाते हैं। कहते हैं खून के रिश्ते ऊपर वाला बनाता है वे अमिट होते हैं खून के रंग से गहरे और रगों में बहते हैं। वक़्त ने रिश्तों की परिभाषा बदल दी ,लक्ष्मी ने खून को पानी कर दिया। स्वार्थ ने अपने को पराया कर दिया। बस एक रिश्ता आज भी ...
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  November 29, 2014, 8:42 pm
रिश्ते बनते हैं बिगड़ते हैं और और फिर ख़त्म हो जाते हैं। कहते हैं खून के रिश्ते ऊपर वाला बनाता है वे अमिट होते हैं खून के रंग से गहरे और रगों में बहते हैं। वक़्त ने रिश्तों की परिभाषा बदल दी ,लक्ष्मी ने खून को पानी कर दिया। स्वार्थ ने अपने को पराया कर दिया। बस एक रिश्ता आज भी ...
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  November 29, 2014, 8:42 pm
कितने अजीब होते हैं ये भाव मन में उमड़े बादल से जल्दी से उठी सोचा दर्ज कर लूँ ,कागज और कलम जब तक हाथ में आई वो कपूर की तरह काफूर चुके थे। बहुत सोचा वो शब्द क्या थे ?वो बात क्या थी ?शब्दों में से कोई एक पकड़ में नहीं आया और फिर कलम रख दी। कुछ  लिखने को था ...
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  September 8, 2014, 2:57 pm
जिंदगी अपनीजन्म से जिनके हाथों में ,जिनकी मर्जी परऔर जिनके लिएजीते रहे , उस  रूप कोहम आज कठपुतली कानाम देते हैं।शास्त्रों ने जिसेशास्त्रोक्त बतायाउसी तरह जिया हमने।चाहे वह,बेटी  बहन , पत्नी या फिर माँ रही हो।सात पर्दों में रखा , फिर भी सायाऔर शासन पुरुष का रहा।व...
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  September 4, 2014, 4:19 pm
 दर्द पेड़ों का समझ नहीं सकते , बदलते हुए मौसम ने उन्हें पत्तों से जुदा  कर दिया . मेरे आँगन में खड़े वो दो अमरूद के पेड़ जिनके आंसुओं की जगह पत्ते गिर रहे हैं पतझड़ गुजरे  महीनों हो गए। फिर से फूलने के दिन हैं और वे भादों में लहलहाने और फूलों से लदे होने के अहसास को भूल गए...
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  August 26, 2014, 5:18 pm
अंतर की ज्वालामुखी जब पिघलती है लावा बन वो कलम से आग उगलती है। वाह ! वाह ! सुनकर वो सिर पटक कर रो देती है - दर्द सहा उसने ,जहर पिया  उसने ,मन की तपिश में झुलसी क्या उसकी तपिश को किसी ने महसूस किया ?नहीं बची संवेदनाएं जो उसकी कलम से निकले लफ्जों की ...
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  July 17, 2014, 2:05 pm
नारी तू लेकर नाता अपने आंसुओं से धरती पर पैदा ही क्यों हुई ?जब छोटी सी बच्ची भर भर आँखें क्यों रोती है ?जोड़ कर अपनी गुड़िया से रिश्ता स्नेह का विदा किया तो फूट फूट कर रोई। उम्र बढ़ी तो हर पल ये अहसास उसको जाना है ,वह परायी है ,ये उसका घर नहीं ,बार बार उस...
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  June 4, 2014, 1:06 pm
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