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श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता : View Blog Posts
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श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता

श्रीमहादेवजी कहते हैं:-पार्वती! अब मैं अठारहवें अध्याय के माहात्म्य का वर्णन करता हूँ, परमानन्द को देने वाला अठारहवें अध्याय का यह पावन माहात्म्य जो समस्त वेदों से भी उत्तम है, इसे तुम श्रद्धा-पूर्वक श्रवण करो। यह सम्पूर्ण शास्त्रों में सर्वश्रेष्ठ है, संसार के तीन...
श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता...
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  April 27, 2014, 12:59 pm
भगवान श्रीकृष्ण प्रत्येक इंसान से विभिन्न विषयों पर प्रश्न करते हैं और उन्हें माया रूपी संसार को मन से त्यागने को कहते हैं, भगवान का कहना है कि पूरी जिंदगी सुख पाने का एक और केवल एक ही रास्ता है और वह है उनके प्रति पूरा समर्पण।तुम क्यों व्यर्थ चिंता करते हो? तुम क्यों भ...
श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता...
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  September 20, 2010, 7:30 pm
श्री पार्वती जी ने कहाःभगवन् ! आप सब तत्त्वों के ज्ञाता हैं, आपकी कृपा से मुझे श्रीविष्णु-सम्बन्धी नाना प्रकार के धर्म सुनने को मिले, जो समस्त लोक का उद्धार करने वाले हैं, देवादिदेव ! अब मैं गीता का माहात्म्य सुनना चाहती हूँ, जिसका श्रवण करने से श्री हरि की भक्ति बढ़ती है...
श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता...
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  September 10, 2010, 7:30 pm
(योद्धाओं की गणना और सामर्थ्य) धृतराष्ट्र उवाचधर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ (१) भावार्थ : धृतराष्ट्र ने कहा - हे संजय! धर्म-भूमि और कर्म-भूमि में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे पुत्रों और पाण्डु के पुत्रों ने क्य...
श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता...
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  September 1, 2010, 8:15 pm
श्री भगवान कहते हैं: प्रिये! अब दूसरे अध्याय के माहात्म्य बतलाता हूँ। दक्षिण दिशा में वेदवेत्ता ब्राह्मणों के पुरन्दरपुर नामक नगर में देव शर्मा नामक एक विद्वान ब्राह्मण रहता था, वह अतिथियों की सेवा करने वाला, स्वाध्याय-शील, वेद-शास्त्रों का विशेषज्ञ, यज्ञों का अनुष्...
श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता...
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  August 30, 2010, 8:30 pm
(अर्जुन के शोक का कारण) संजय उवाचतं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्‌ ।विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ (१) भावार्थ : संजय ने कहा - इस प्रकार करुणा से अभिभूत, आँसुओं से भरे हुए व्याकुल नेत्रों वाले, शोकग्रस्त अर्जुन को देखकर मधुसूदन श्रीकृष्ण ने यह शब्द कहे। (१)...
श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता...
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  August 20, 2010, 8:45 pm
श्री भगवान कहते हैं:प्रिये ! जनस्थान में एक जड़ नामक ब्राह्मण था, जो कौशिक वंश में उत्पन्न हुआ था, उसने अपना जातीय धर्म छोड़कर व्यापारिक वृत्ति में मन लगाया उसे परायी स्त्रियों के साथ व्यभिचार करने का व्यसन पड़ गया था, वह सदा जुआ खेलता, शराब पीता और शिकार खेलकर जीवों की ह...
श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता...
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  August 10, 2010, 8:15 pm
(कर्म-योग और ज्ञान-योग का भेद)अर्जुन उवाचज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥ (१) भावार्थ : अर्जुन ने कहा - हे जनार्दन! हे केशव! यदि आप निष्काम-कर्म मार्ग की अपेक्षा ज्ञान-मार्ग को श्रेष्ठ समझते है तो फिर मुझे भयंकर कर्म (युद...
श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता...
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  August 1, 2010, 8:30 pm
श्रीभगवान कहते हैं: प्रिये ! अब मैं चौथे अध्याय का माहात्म्य बतलाता हूँ, सुनो। गंगा के तट पर वाराणसी नाम की एक पुरी है, वहाँ विश्वनाथ जी के मन्दिर में भरत नाम के एक योग-निष्ठ महात्मा रहते थे, जो प्रतिदिन आत्म-चिन्तन में तत्पर हो आदर-पूर्वक गीता के चतुर्थ अध्याय का पाठ किय...
श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता...
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  July 30, 2010, 7:30 pm
(कर्म-अकर्म और विकर्म का निरुपण)श्री भगवानुवाचइमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्‌ ।विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्‌ ॥ (१)भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - मैंने इस अविनाशी योग-विधा का उपदेश सृष्टि के आरम्भ में विवस्वान (सूर्य देव)को दिया था, विवस्वान ने यह...
श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता...
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  July 20, 2010, 7:45 pm
श्री भगवान कहते हैं: हे देवी! अब सब लोगों द्वारा सम्मानित पाँचवें अध्याय का माहात्म्य संक्षेप में बतलाता हूँ, सावधान होकर सुनो। मद्र देश में पुरुकुत्सपुर नामक एक नगर है, उसमें पिंगल नामक एक ब्राह्मण रहता था, वह वेदपाठी ब्राह्मणों के विख्यात वंश में, जो सर्वदा निष्कलंक...
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  July 10, 2010, 7:15 pm
(सांख्य-योग और कर्म-योग के भेद)अर्जुन उवाचसंन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्‌ ॥ (१) भावार्थ : अर्जुन ने कहा - हे कृष्ण! कभी आप सन्यास-माध्यम(सर्वस्व का न्यास=ज्ञान योग) से कर्म करने की और कभी निष्काम माध्यम से कर्म करने (...
श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता...
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  July 1, 2010, 7:30 pm
श्री भगवान कहते हैं: सुमुखि ! अब मैं छठे अध्याय का माहात्म्य बतलाता हूँ, जिसे सुनने वाले मनुष्यों के लिए मुक्ति आसान हो जाती है, गोदावरी नदी के तट पर प्रतिष्ठानपुर (पैठण) नामक एक विशाल नगर है, जहाँ मैं पिप्लेश के नाम से विख्यात होकर रहता हूँ, उस नगर में जनश्रुति नामक एक राज...
श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता...
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  June 30, 2010, 8:29 am
(योग में स्थित मनुष्य के लक्षण) श्रीभगवानुवाचअनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ (१) भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - जो मनुष्य बिना किसी फ़ल की इच्छा से अपना कर्तव्य समझ कर कार्य करता है, वही संन्यासी है और वही योगी है, न तो अ...
श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता...
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  June 20, 2010, 8:33 am
भगवान शिव कहते हैं:- हे पार्वती ! अब मैं सातवें अध्याय का माहात्म्य बतलाता हूँ, जिसे सुनकर कानों में अमृत भर जाता है, पाटलिपुत्र नामक एक दुर्गम नगर है जिसका द्वार बहुत ही ऊँचा है, उस नगर में शंकुकर्ण नामक एक ब्राह्मण रहता था, उसने वैश्य वृत्ति का आश्रय लेकर बहुत धन कमाया क...
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  June 10, 2010, 5:02 am
(विज्ञान सहित तत्व-ज्ञान) श्रीभगवानुवाचमय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः।असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥ (१)भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - हे पृथापुत्र! अब उसको सुन जिससे तू योग का अभ्यास करते हुए मुझमें अनन्य भाव से मन को स्थित करके और मेरी शरण होकर स...
श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता...
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  June 1, 2010, 5:04 am
भगवान शिव कहते हैं:-हे देवी ! अब आठवें अध्याय का माहात्म्य सुनो, उसके सुनने से तुम्हें बड़ी प्रसन्नता होगी, लक्ष्मीजी के पूछने पर भगवान विष्णु ने उन्हें इस प्रकार आठवें अध्याय का माहात्म्य बतलाया था।श्री भगवान बोलेः-दक्षिण में आमर्दकपुर नामक एक प्रसिद्ध नगर है, वहाँ भ...
श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता...
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  May 30, 2010, 7:11 pm
(अर्जुन के सात प्रश्नो के उत्तर)अर्जुन उवाचकिं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम।अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥ (१)भावार्थ : अर्जुन ने पूछा - हे पुरुषोत्तम! यह "ब्रह्म"क्या है? "अध्यात्म"क्या है? "कर्म"क्या है? "अधिभूत"किसे कहते हैं? और "अधिदैव"कौन कहलात...
श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता...
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  May 20, 2010, 7:21 pm
भगवान शिव कहते हैं:-पार्वती अब मैं आदरपूर्वक नौवें अध्याय के माहात्म्य का वर्णन करुँगा, तुम स्थिर होकर सुनो। नर्मदा के तट पर माहिष्मती नाम की एक नगरी है, वहाँ माधव नाम के एक ब्राह्मण रहते थे, जो वेद-वेदांगों के तत्वज्ञ और समय-समय पर आने वाले अतिथियों के प्रेमी थे, उन्हों...
श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता...
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  May 10, 2010, 6:36 am
(सृष्टि का मूल कारण)श्रीभगवानुवाचइदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌ ॥ (१)भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - हे अर्जुन! अब मैं तुझ ईर्ष्या न करने वाले के लिये इस परम-गोपनीय ज्ञान को अनुभव सहित कहता हूँ, जिसको जानकर तू ...
श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता...
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  May 1, 2010, 6:38 am
भगवान शिव कहते हैं:-देवी! अब तुम दशवें अध्याय के माहात्म्य की परम पावन कथा सुनो, जो स्वर्गरूपी दुर्ग में जाने के लिए सुन्दर सोपान और प्रभाव की चरम सीमा है। काशीपुरी में धीरबुद्धि नाम से विख्यात एक ब्राह्मण था, जो मेरी प्रिय नन्दी के समान भक्ति रखता था, वह पावन कीर्ति के अ...
श्रीमद्‍ भगवद्‍ गीता...
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  April 30, 2010, 6:00 pm
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