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श्री राम चरित मानस

॥ चौपाई ॥ बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो॥(१)भावार्थ:- मैं श्रीरघुनाथ जी के "राम"नाम की वंदना करता हूँ, जो कि अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा को प्रकाशित करने वाला है। "राम"नाम ब्रह्मा, विष्णु, महेश और समस्त वेद...
श्री राम चरित मानस...
रवि कान्त शर्मा
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  May 12, 2014, 9:31 am
श्लोकवर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ (१)भावार्थ:- शब्दों के अर्थ समूहों, रसों, छन्दों और मंगलों को करने वाली श्री सरस्वती जी और श्री गणेश जी की मैं वंदना करता हूँ। (१)भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।याभ्यां विना...
श्री राम चरित मानस...
रवि कान्त शर्मा
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  December 31, 2013, 5:26 pm
॥ सोरठा ॥ बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥ (५)भावार्थ:- मैं गुरु जी के चरण-कमल की वंदना करता हूँ, जो कृपा के सागर हैं, मनुष्य रूप में श्री भगवान ही हैं, जिनके वचन घोर अन्धकार रूपी महान मोह का नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समान हैं...
श्री राम चरित मानस...
रवि कान्त शर्मा
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  December 30, 2013, 4:24 pm
॥ चौपाई ॥बंदउँ अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष नसावनि॥प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी। ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी॥ (१)भावार्थ:- मैं अति पावन श्री अयोध्यापुरी और कलियुग के पापों का नाश करने वाली पवित्र सरयू नदी की वन्दना करता हूँ, मैं अवधपुरी के उन नर-नारियों को प्रणाम...
श्री राम चरित मानस...
रवि कान्त शर्मा
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  December 23, 2013, 9:09 am
॥ श्लोक ॥यस्यांके च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तकेभाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्।सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदाशर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्री शंकरः पातु माम्‌॥ (१)भावार्थ:- जिनकी गोद में हिमायल की पुत्री पार्वती जी, मस्तक पर गंगा जी, लला...
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रवि कान्त शर्मा
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  July 31, 2013, 9:03 pm
॥ श्लोक ॥मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददंवैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्‌।मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शंकरंवंदे ब्रह्मकुलं कलंकशमनं श्री रामभूपप्रियम्‌॥ (१)भावार्थ:- धर्म रूपी वृक्ष के मूल, विवेक रूपी समुद्र को आनंद देने वा...
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रवि कान्त शर्मा
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  December 31, 2012, 9:21 pm
॥ श्लोक ॥कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौशोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ।मायामानुषरूपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौ हितौसीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि नः॥ (१)भावार्थ:- कुन्दपुष्प और नीलकमल के समान सुंदर गौर एवं श्यामवर्ण, अत...
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रवि कान्त शर्मा
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  July 31, 2012, 9:42 pm
॥ श्लोक ॥शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदंब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्‌।रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिंवन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्‌॥ (१)भावार्थ:- शान्त, सनातन, अप्रमेय (प्रमाणों से परे), निष्पाप, ...
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रवि कान्त शर्मा
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  December 31, 2011, 9:44 pm
श्लोकवर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ (१)भावार्थ:- शब्दों के अर्थ समूहों, रसों, छन्दों और मंगलों को करने वाली श्री सरस्वती जी और श्री गणेश जी की मैं वंदना करता हूँ। (१)भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।याभ्यां विना...
श्री राम चरित मानस...
रवि कान्त शर्मा
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  December 31, 2011, 5:26 pm
॥ सोरठा ॥ बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥ (५)भावार्थ:- मैं गुरु जी के चरण-कमल की वंदना करता हूँ, जो कृपा के सागर हैं, मनुष्य रूप में श्री भगवान ही हैं, जिनके वचन घोर अन्धकार रूपी महान मोह का नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समान हैं...
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रवि कान्त शर्मा
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  December 30, 2011, 4:24 pm
॥ चौपाई ॥ बंदउँ प्रथम महीसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना॥सुजन समाज सकल गुन खानी। करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी॥ (२)भावार्थ:- पहले मैं इस पृथ्वी के देवता स्वरूप ब्राह्मणों के चरणों की वन्दना करता हूँ, जो मोह रूपी अज्ञान से उत्पन्न सभी प्रकार के भ्रम को दूर वाले हैं। फिर मैं ...
श्री राम चरित मानस...
रवि कान्त शर्मा
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  December 29, 2011, 7:16 pm
॥ चौपाई ॥ बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ॥पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें॥ (१)भावार्थ:- अब मैं शुद्ध मन-भाव से सभी असुर स्वभाव वाले मनुष्यों को प्रणाम करता हूँ, जो बिना किसी कारण के दूसरों को कष्ट पहुँचाने वाले हैं। जिनके दृष्टि म...
श्री राम चरित मानस...
रवि कान्त शर्मा
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  December 28, 2011, 5:24 pm
॥ चौपाई ॥ बंदउँ संत असज्जन चरना। दुःखप्रद उभय बीच कछु बरना॥बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं॥ (२)भावार्थ:- मैं देवता स्वभाव वाले मनुष्यों (संत) और आसुरी स्वभाव वाले मनुष्यों (असंत) के चरणों की वन्दना करता हूँ, दोनों की संगति ही दुखदायी होती है लेकिन दोनो...
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रवि कान्त शर्मा
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  December 27, 2011, 7:43 pm
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि॥ (७ ग)भावार्थ:- इस संसार में जो भी जड़ और चेतन जीव हैं, उन सभी को भगवान राम का स्वरूप जानकर मैं उन सभी के चरण कमलों की सादर दोनों हाथ जोड़कर वन्दना करता हूँ। (७ग)देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब।बंदउँ ...
श्री राम चरित मानस...
रवि कान्त शर्मा
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  December 26, 2011, 9:01 pm
चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे। पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे॥कलि के कबिन्ह करउँ परनामा। जिन्ह बरने रघुपति गुन ग्रामा॥ (२)भावार्थ:- उन सभी के चरणकमलों में प्रणाम करता हूँ, जो मेरे सभी मनोरथों को पूरा करेंगे, कलियुग के भी उन कवियों को मैं प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने श्री रघुनाथ जी के ...
श्री राम चरित मानस...
रवि कान्त शर्मा
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  December 25, 2011, 2:53 pm
सोरठाबंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ।सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित॥ (१४ घ)भावार्थ:- मैं उन वाल्मीकि मुनि के चरण कमलों की वंदना करता हूँ, जिन्होंने अति निर्मल रामायण की रचना की है, जो सभी दुष्ट स्वभाव वालों को दोष मुक्त करके अति कोमल और सुन्दर बनाने वाली है। (...
श्री राम चरित मानस...
रवि कान्त शर्मा
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  December 24, 2011, 12:56 pm
॥ श्लोक ॥रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहंयोगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्‌।मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवंवन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम्‌॥ (१)भावार्थ:- कामदेव के शत्रु शिवजी के सेव्य, भव (जन्म-मृत्य...
श्री राम चरित मानस...
रवि कान्त शर्मा
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  July 31, 2011, 9:49 pm
॥ श्लोक ॥केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नंशोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम्‌। पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानंनौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम्‌॥ (१)भावार्थ:- मोर के कण्ठ की आभा के समान (हरिताभ) नीलवर्ण, देव...
श्री राम चरित मानस...
रवि कान्त शर्मा
Tag :
  December 31, 2010, 9:54 pm
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