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अनुभूतियों का आकाश

आज फिर नींद नही आईपता नहीं क्योऐसे तो नींद  हर रात मे  बड़ी मुश्किल से आती हैयहाँ से वहाँचहलकदमी करता मैंमुड़कर वापस बिस्तर को देखता हूँतो नेपथ्य से गूँजती हैअजीब सी  आवाज़शायद सो गई है वोअभी तो खाना खाया था साथ मेइतनी जल्दीकैसे सो जाती है वोक्या कुछ भी नहीं चलता उसक...
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  June 14, 2016, 6:10 pm
मेरे जेहन से एक पत्थर उछलामैंने सोचा उसके हृदय मे लगा उसने मुझे देखा ही नहींमैंने सोचा शायद मेरा भ्रम है पत्थर शायद उछला ही नहींमैंने रास्ते से कटीली झाड़ियाँ बटोरींऔर उसके निकास पर बिछा दीवो उनपर पैर रखकर चला गयामैंने देखा कुछ दूर जाकर उसने पैर के काटें निकालेऔ...
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  June 7, 2016, 12:36 pm
तुमने मेरे लिए क्या कियाये ज्वलंत सवाल गाहे बगाहे जीवन  को छलनी करता रहाऔर मैं आगे और आगे बढ़ता रहा मैंने सोचा वाकई गहरा है ये पूछना तुमने क्या किया एक शून्य हो जाता है मेरे चारो तरफऔर मैं उन शून्य हुयेगुब्बारे में घुसा , उल्टा होता रहता हू बलून मे कोई द्वार नहीं होता ...
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  June 3, 2016, 1:51 pm
रात के ग्यारह बजे थेतेज रफ्तार गाड़ी घर को भागी जा रही थीफर्राट , कोई रोक टॉक नहीं न ही लाल लाल चेहरे किए,इस पर, उस पर ताना कसते, चेहरेन ही आगे निकालने की होडन ही पीछे आते गाड़ी के हार्न का शोरसब कुछ एकदम शांत अचानक आगे मोड पर एक अस्सी साल केराम नामी दुपट्टा ओढ़े साधूगा...
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  June 2, 2016, 11:50 am
उम्र के दिलकश नज़ारे साथ थेजीने के अद्भुत सहारेसाथ थे बोलता था हृदय अबोला जो रहा एहसास के स्नेहिल किनारे साथ थे रफ्ता रफ्ता उम्र निकलती ही रही छिप के बैठे प्यार सारेसाथ थे चाँद का सौन्दर्य चाँदनी की कलागुलाब के फूलों कामहका जलजला सुगंध योंवन के सिता...
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  May 31, 2016, 12:51 pm
जी लिए बहुतऔर जी कर भी करेंगे क्यापी लिए आंशू बहुतकुछ और पीकर भी करेंगे क्याबचपनबिना कुछ सोचता फिरता रहायौवनगुलाबी ,साँझ सी बुनता रहाबुन लिएज़िंदगी के  तारकाँटों के करीबतने रहकर भी चुभेझुककर चले तोचिर गई पीठसामने देखा तो मंजरऔर भी वीभत्स थाज़िंदगी से हार मानेबैठा ह...
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  May 10, 2016, 3:55 pm
शाम जब झुरमुट से निकाल करमेरे आगोश मे फैलने लगी मुझे आभाष हुआ रात होने लगी चौपाल पर बाबा अभी भी बैठे है  पता नहीं क्योंये तो उनका खाने का समय हैन वो चीखे न चिल्लाये सूरज डूब रहा है खाना कहाँ हैसूरज ढल जाने के बाद वो नहीं खातेचाहे भूंखे ही सो जाये नियम नहीं टूटतानियम तो उ...
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Tag :गाव
  May 3, 2016, 2:17 pm
बांस की खपच्चियाँदेखीं हैं तुमनेहसिए से चीर करकई टुकड़ों मे विभक्त किया जाता है जिन्हेंऔर वो कभी उफ भी नहीं करतींचिर  करमानव के काम आने वाली वस्तु बन जातीं हैऔर अपने वजूद को कभी याद नहीं रखतींइस आकार से पहलेक्या था उसका अस्तित्वशायद ही याद रह पाता हो उन्हेंझुंड मे ल...
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Tag :पत्नी
  April 27, 2016, 12:16 pm
कल रात मेरे शहर कीहवा बदल गईसूरज चढ़ आया थामगर दिन नहीं हुआअंधेरा ही बना रहाआसमान पर टिमटिमाते रहे तारेअठखेलिया करता रहा चाँददिन चर्या ही शुरू नहीं हुयीसारी गालियां रहीं सूनीबस घड़िया नहीं रुकींसरपट भागता रहा समयपेड़ों पर सोये रहे पक्षीगौरैया तो पहले ही गायब  थीअब क...
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  April 25, 2016, 3:15 pm
अनुभूतियों का आकाश: एक अदद चेहराकापीराइट सुरक्षित महेश कुशवंश...
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  April 20, 2016, 5:00 pm
कभी सोचता हूँतो याद आता है मुझेअपना अक्श,गड्ड मड्ड,आकार रहित,बिना आँख कान नाक ,एकदम सपाट चेहराशायद अनगढ़,संवेदना व्यक्त करती आंखे,शायद बनी ही नहींमाथे पर आडी तिरछी लकीरेंजो बस आंतरिक सुनामी कोआयाम देतीं,कोई देखे तो  दूर से ही समझ लेकटीली झड़ियोंऔर अनेकों झंझावातों से...
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Tag :चेहरा
  April 20, 2016, 11:44 am
मैं भूंखा हू अए  रोटी तुम कहाँ हो  ?कब से नहीं देखा तुम्हें साबूत बस टुकड़ों मे ही दिखाई देती होबहन भाइयों मेँ बटी हुयी कभी धूल मे सनी कभी पानी मे गीली गीलीमाँ भी कैसी है  चूल्हा तो जलाती हैमगर रोटी नहीं बनाती बस इधर उधर कूडे  से बीन लाती हैहाँ शहनाई और ब...
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  April 16, 2016, 2:46 pm
दोपहर थीलगभग तीन बजा थामोबाइल बजाप्रतापगढ़ वाले मामा जी थेएक गंभीर हादसे की सूचना दे रहे थेतेईश साल का अमर मैसूर के पास पिकनिक मनाते हुयेनदी मे बह गयापिता के पास एक लड़की का फोन आयाअमर  के ही  फोन से"अमर  इस नो मोर"ये क्या हुआ ? किसी को समझ मे नहीं आयाबड़ा भाई आनन फानन बं...
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  April 16, 2016, 2:26 pm
आओ माँ इन गलियों मेंभक्तों का उद्धार करो भटक गए जो पथ से बंदे उनका बेड़ा पार करोअन्तर्मन मे चलता है कुछ बाहर मन करता कुछ और चंचल मन उड़ता फिरता है असंतोष का भीषण दौररिस्ते-नाते गौण हुये सबशोहरत , पैसा हुआ प्रबल जी लों जितना जी पाओ तुम  कब,  किसने देखा है कलसमव...
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  April 8, 2016, 1:04 pm
धीरे धीरे वो कुछ इतने करीब  आए कानों मे जैसे कोई लय गुनगुनाए फासले मिटने लगे कलियों के  खिलने की तरहधुप्प अंधेरी रात जैसे दूधिया रोशनी मे नहायेसोचता हू तुझको तो धड़कनें गिन लेता हूँ बिखरे हुये बाल जैसे सुबह की शबनम मे नहाये घुली जाती है महक यहाँ वह...
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  March 31, 2016, 11:07 am
त्योहार की तैयारी मेकौन कितना आगे गयाकिसने किस पर कितना रंगा बिखेराकिसी को याद नही रहामेज पर सजे रहेतरह तरह के पकवानकई दिनों बासी होते रहेउनमे से एक तिहाई भी खर्च नहीं हुयेनहीं खाये गएजो खाये गए उनमेगिनती घर वालों की भी थी दरवाजे पर घंटी बजीकोई आयामाली थामालकिन त्यो...
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  March 28, 2016, 4:52 pm
होली मेंकुछ गाल बजाओरंग जमाओखिड़की से घुस, चुपके चुपकेरंगों की बौछार गिराओरंग जमाओभाभी से मत मौका चूकोसाली के  लवकानों फूँकोवेलेंटाइन से पेच लड़ाओरंग जमाओदोस्तों के संगढ़ोल नगाड़ेभंग चढा, मिरदंग बाजा रेराधा बन के,   नाचो प्यारेसारे आम महिला बन जाओरंग जमाओफागुन में, ...
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  March 22, 2016, 4:41 pm
छत सेगलियारे सेछत की मुडेर सेन जाने कब सेजो चिड़ियाँ चहचहाती हैउनमे से कोई भी विदेशी  नहींनिहायत देसी गौरैया है येइसकी घण्टियों सी आवाज़हृदय को झंकृत करती हुयीनस नस मे उतरजाती हैकल कल करते झरनेझरने मे अठखेलियाँ करतेजल क्रीडा करते पंक्षीआग उगलते सूरज की गर्मी  मेत...
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  March 21, 2016, 5:46 pm
....कल रात मे नींद नही आई बहुत देर तक करवटें बदलने के बाद कब झपक गया पता नहींजब आँख खुली तो फगुनायी चेतना मे सराबोर था आँखें बंद थी या यू कहूँखोलने का मन ही नही था एक बहुत बोल्ड लिखने वाली ब्लॉगर ने न जाने कहाँ कहाँ गुलाल बिखेर  दिया था और मैं हो गया था गुलाबीए...
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  March 16, 2016, 3:07 pm
....कल रात मे नींद नही आई बहुत देर तक करवटें बदलने के बाद कब झपक गया पता नहींजब आँख खुली तो फगुनायी चेतना मे सराबोर था आँखें बंद थी या यू कहूँखोलने का मन ही नही था एक बहुत बोल्ड लिखने वाली ब्लॉगर ने न जाने कहाँ कहाँ गुलाल बिखेर  दिया था और मैं हो गया था गुलाबीए...
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  March 16, 2016, 3:07 pm
हम आज़ाद हैंदेश भी आज़ाद हैदेश की हवा, पानी सब आज़ाद हैंकौन सी हवा कहाँ रोकनी हैकिसको कौन सी हवा मिलनी चाहिएकिसको कौन सा पानी मिलना चाहिएसब कुछ तय नहीं हो सकताऔर न ही तय हो सकता है भविस्यवर्तमान को घायल करहवाओं मे तैरते प्रश्नों के उत्तर नही हो सकतेऔर हर प्रश्न के उत्तर भी...
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  March 10, 2016, 11:32 am
सुबह ,बड़े तड़के उठकरएक गोली खाली पेट खाकर भागतीस्नान ध्यान , पूजा-पाठ, नास्ता बनाने की हड़बड़ीऔर फिर खाने की तैयारीछोटे बच्चों की परवरिश से निब्रत  होकर भीदिनचर्या  नहीं बदल पायी उसकीपति को आफिस भेजकरअम्मा नासता कर लो की हुंकार लगा करदो रूखी रोटिया , सूखी सब्जी सेअखबा...
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  March 8, 2016, 10:46 am
कहते हैं सबये राजनीति वोटों तक ही नही सीमित होनी चाहिएउससे आगे भी जानी चाहिएतुम्हारी जाति क्या हैक्या है तुम्हारा मजहबअगड़े हो क्याया मनुवादी , या फिरपिछड़ाउससे भी पिछड़ामहा पिछड़ादलितउससे भी दलितमहा दलितऔर इन सबका कुछ न कुछ आरक्षणशब्द बदलते गएआदमी वहीं का वहींराजनी...
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  March 1, 2016, 10:59 am
कल जब मैं आखिरी बारतुम्हारे घर से निकलान जाने क्यों मुझे  सब कुछअपना सा लगाशब्दों की तलवार ने काट रखे थे  मेरेदोनों बाजूऔर मैं खोजता रह गया कलमलिखने को प्यार की नई परिभाषाजिस  परिभाषा मे होतुम्हारा जिस्मऔर मेरे अरमानों का खूनलिव-इन-रीलेशन निभाते रहने की कलाऔर क...
अनुभूतियों का आकाश...
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  February 23, 2016, 2:05 pm
जननी ,जन्मभूमिस्वर्ग से भी बड़ी हैका पाठ  पढ़ते पढ़तेन जाने कब बड़े हो गए हम इतने बड़े की याद ही नही रहे , मातृभूमि और स्वतन्त्रता के मायनेअभिव्यक्ति की आजादी और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अर्थ बदल गई देशद्रोह की परिभाषा हम भूल गये , माँ के आँचल की परवरिश लावण्य औ...
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  February 16, 2016, 12:00 pm
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