साहित्य शिल्पी

"पापा, भगवानजी तो इन्सानों को बड़ी मेहनत से बनाते होंगे।  जब एक इंसान दूसरे इंसान को मार डालता है, तो भगवानजी की सारी मेहनत बेकार हो जाती होगी न!"  -- एक पाँच साल का बच्चा अपने पिता से... --------------------------------------------------------------------------  रचनाकार परिचय:- नाम : सुशांत सुप्रिय ( कवि , क...
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Tag :सुशांत सुप्रिय
  March 24, 2015, 12:00 am
शहीद-ए-आज़म भगतसिंह की शहादत को साहित्यशिल्पी परिवार स्मरण करते हुए नतमस्तक है।  आज प्रस्तुत है साहित्य शिल्पी पर विभिन्न समयों में प्रकाशित भगतसिंह पर केन्द्रित अनेक रचनाओं का संकलन जिसे नीचे दी गयी कडियों पर जा कर पढा जा सकता है -   अ)     भगत सिंह की शहादत से सम्बन्ध...
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Tag :
  March 23, 2015, 12:00 am
क्या लाना है बाज़ार से  पूछते हो तुम  वह लिस्ट थमा देती है।  लो तुम्हारा सब सामान ले आया। रचनाकार परिचय:- एक शिक्षाविद के रूप में कार्यरत व स्वेच्छा से एक सम्वेदनशील सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ ही सर्वोपरि एवं सर्वप्रथम डा0 छवि निगम एक उत्साही लेखिका हैं। र...
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Tag :डॉ छवि निगम
  March 22, 2015, 12:00 am
दो अंधे हैं। एक की दौड़ पूरब की ओर है। दूसरे की पश्चिम की ओर। दौड़ते दौड़ते वे अक्सर ही एक दूसरे से टकरा जाते हैं। "देख कर नहीं चल सकता?"पहला बौखला कर चीखता है, "अंधा है क्या?""ठीक कहते हो भाई।"दूसरा हवा में उसे टोकते हुए शांत स्वर में  कहता है, "दोनों आँखें फूटी हुई हैं। पर, तेरी ...
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Tag :लघुकथा
  March 21, 2015, 12:00 am
[अरुण शौरी की पुस्तक पर एक विमर्श] ------------------------ विचारधाराओं ने इतिहास का किस तरह कूडा कर दिया है, इसकी परत दर परत खोलती है अरुण शौरी की वाणी प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक “जाने माने इतिहासकार – कार्यविधि, दिशा और उनके छल”। आप किसी भी धारा-विचारधारा के हों किंतु इतिहास को जान...
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Tag :राजीव रंजन प्रसाद
  March 20, 2015, 12:00 am
जाको प्रिय न घूस-घोटाला... वाको तजो एक ही पल में, मातु, पिता, सुत, साला. ईमां की नर्मदा त्यागयो,  न्हाओ रिश्वत नाला.. नहीं चूकियो कोऊ औसर, कहियो लाला ला-ला. शक्कर, चारा, तोप, खाद हर सौदा करियो काला.. नेता, अफसर, व्यापारी, वकील, संत वह आला. जिसने लियो डकार रुपैया, डाल सत्य पर ताला.. 'रि...
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Tag :कविता
  March 19, 2015, 12:00 am
दिल में छुपे है घोर अंधेरेकोई तो आकर दीप जलाए. यादों के साए मीत है मेरेकोई उन्हें आकर सहलाए. टकराकर दिल यूँ है बिखराबनके तिनका तिनका उजडाचूर हुआ है ऐसे जैसेशीशे से शीशा टकराए. चोटें खाकर चूर हुआ वोजीने पर मजबूर हुआ वोजीना मरना बेमतलब काक्या जीना जब दि...
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Tag :देवी नागरानी
  March 18, 2015, 12:00 am
प्रेमचंद ने सन 1936 में अपने लेख ‘महाजनी सभ्यता’ में लिखा है कि ‘मनुष्य समाज दो भागों में बँट गया है । बड़ा हिस्सा तो मरने और खपने वालों का है, और बहुत ही छोटा हिस्सा उन लोगों का था जो अपनी शक्ति और प्रभाव से बड़े समुदाय को बस में किए हुए हैं । इन्हें इस बड़े भाग के साथ किसी तर...
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Tag :शैलेन्द्र चौहान
  March 17, 2015, 12:00 am
गतांक (संविधान-सभा में राजभाषा विचार [लेख] - भाग 3, संविधान-सभा में राजभाषा विचार [लेख] - भाग 2) व संविधान-सभा में राजभाषा विचार [लेख] - भाग 1 से आगे... पन्द्रह वर्ष की कालावधि के बाद अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग समाप्त होना चाहिए था। पन्द्रह वर्ष की अवधि सन् 1965 में समाप्त होने वाली थी...
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Tag :महावीर सरन जैन
  March 16, 2015, 12:00 am
चीटी मेरी बेस्ट फ्रेंड है, बी ए. पास बी एड. ट्रेंड है। हर दिन लाँग ड्राइव पर जाती, अपने खुद को खुद ही चलाती। शक्कर गुड जैसे भोजन को, अपने सिर पर रख ले आती। करती है दिन रात परिश्रम, नहीं काम का कभी एंड है। चीटी मेरी बेस्ट फ्रेंड है। चलती है तो चलती जाती, बिना रुके ही बढ़ती...
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Tag :बाल कविता
  March 15, 2015, 12:00 am
एक ऐसा नाम जो ना कोई  महानायक का है  ना कोई बड़े गायक का  ना ही किसी भाग्य विधायक का  यह तो नाम है रचनाकार परिचय:- संतोष पटेल जन्म - 4 मार्च, 1974,बेतिया, पश्चिम चंपारण, बिहार सम्प्रति - संपादक - भोजपुरी ज़िन्दगी, सह संपादक - पुर्वान्कूर, (हिंदी - भोजपुरी ), साहित्यिक संपादक - डिफें...
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Tag :संतोष पटेल
  March 14, 2015, 12:00 am
“भाई साहब टाइप करवाना है, कर दोगे क्या?” “जी हाँ” मैंने कहा। एक पेज पकड़ाते हुए युवक ने कहा, “बाकी तो सब आपको ऐसा ही टाइप करना है जैसा इस पेज में लिखा है; बस ट्रांसफर के कारण मैं अलग लिखवाऊँगा।“ “क्यों ? ट्रांसफर के कारण तो ठीक ही लग रहे हैं। मैंने पढ़े हैं।” युवक के साथ आए एक...
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Tag :संजय जनागल
  March 13, 2015, 12:00 am
कवितायें लिखी नहीं जाती वे एक भिन्न मानसिक स्थिति में कवि के अवचेतन से अवतरित होती हैं। अमन दलाल की कविताओं में कुछ इसी तरह की अनुभूति, मौलिकता और ताजगी है। इन कविताओं को किसी सांचे में फिट कर के देखना मुश्किल है, नदी की तरह हैं ये कवितायें और आपको अपने साथ बहा ले जाने मे...
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Tag :पुस्तक समीक्षा
  March 11, 2015, 12:00 am
शादी से पहले भी वह बहुत सफाई-पसन्द थी| विशेषकर ड्राइंगरूम को वह हमेशा सजा-संवरा देखना चाहती थी| उसे बहुत कोफ़्त होती थी जब उसकी सास दीवान पर बैठकर बत्तियां बनाती, मेथी की पत्तियाँ तोड़ती| चादर तो गंदी होती ही मगर अपने तेल से भीगे बालों को दीवार से सटाकर वह अपनी उपस्थिति के ...
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Tag :लघुकथा
  March 10, 2015, 12:00 am
साधारणतः कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। इस कथन को सही अर्थों में दर्शाने के लिए हमें यथार्थ का अवलोकन करना होगा। क्योंकि समाज में जो भी घटनाएँ घटती है - अच्छी हो या बुरी सभी की छाप साहित्य पर पड़ती है। आज से पहले के साहित्य में प्रेम प्रसंग एवं नारी के अंग ...
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Tag :मजीद मिया
  March 9, 2015, 12:00 am
उद्घाटन सत्र में दीप प्रज्वलित करते हुए प्रो. जी. एस. एन. राजु (कुलपति, आंध्र विश्वविद्यालय, विशाखपट्णम) साथ में प्रो. एस. एम. इकबाल, प्रो. चितरंजन मिश्र, डॉ. उमर अली शाह और डॉ. वी. रामाराव विभिन्न विश्वविद्यालयों, संस्थानों और महाविद्यालयों में फरवरी-मार्च के महीने राष्ट्...
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Tag :
  March 8, 2015, 12:00 am
यूं तो जब से होश संभाला, न जाने कितनी होलियाँ खेली होंगी। पर उन सब में से एक होली मुझे आज तक नहीं भूली। उसे याद कर, आज भी रोमांच से भर जाता हूँ। सन् 1970 की बात है। मसें अभी भीगी ही थीं। जवानी की दहलीज पर खड़ा था। मुरादनगर में हम जहाँ रहते थे, वह सरकारी क्वार्टरों का एक मोहल्ला थ...
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Tag :सुभाष नीरव
  March 7, 2015, 12:00 am
दिविक रमेश के नवीनतम कविता संग्रह "माँ गाँव में है"का लोकार्पण सुविख्यात कथाकार और चिन्तक मैत्रेयी पुष्पा की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर डॉ. अजय नावरिया, प्रताप सहगल, डॉ. जितेन्द्र श्रीवास्तव और प्रेम जनमेजय ने विशेष रूप से विचार व्यक्त किए। सभागार में मदन क...
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Tag :समाचार
  March 6, 2015, 12:00 am
होली उल्लास का पर्व है। चारों ओर से छलकते रंगों और उन्मुक्त हास-परिहास के बीच शायद ही कोई होगा जो स्वयं भी इस आनंद-पर्व से अनुप्राणित हो कर रंग-रस से सराबोर न हो उठे। ऐसे में कवियों को होली आकर्षित न करे, यह तो संभव ही नहीं है। यही कारण है कि प्राय: हर दौर में कवियों ने होली ...
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Tag :घनानंद
  March 5, 2015, 12:00 am
भारत संस्कृति में त्योहारों एवं उत्सवों का आदि काल से ही काफी महत्व रहा है। होली भी एक ऐसा ही त्योहार है, जिसका धार्मिक ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व है। पौराणिक मान्यताओं की रोशनी में होली के त्योहार का विराट् समायोजन बदलते परिवेश में विविधताओं का ...
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Tag :ललित गर्ग
  March 4, 2015, 12:00 am
उत्सव हमारी संस्कृति एवं सामाजिक चेतना के जीवंत प्रतीक होते हैं। जीवन की एकरसता को तोड़ने, सामाजिक सद्भाव को बनाए रखने मानव को एक सूत्र में जोड़ने तथा मानवीय संवेदना को सजग रखने में, उत्सवों का विशेष महत्व है। परंतु जैसे जैसे हमारा जीवन आपा-धापी, भागदौड़ तथा अत्यधिक व...
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Tag :प्रेम जनमेजय
  March 2, 2015, 12:00 am
होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय त्योहार है। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका नाम से मनाया जाता था। वसंत की ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने ...
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Tag :प्रीति झा
  March 1, 2015, 12:00 am
बस्तर अंचल में प्रचलित मेले मड़ईयाँ वस्तुत: यहाँ की जीवन रेखायें हैं। इन के माध्यम से समाजशास्त्र को स्वांस मिलती है, इतिहास मुस्कुरा उठता है और अर्थशास्त्र अपनी भूमिका अदा करता है। पूजा पाठ, अर्चना अनुष्ठान, टोना टोटका, झाड़ फूंक के साथ साथ देवी देवता से मान मनौव्वल भी, ...
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Tag :राजीव रंजन प्रसाद
  February 28, 2015, 12:00 am
होली के अवसर पर आज देखें साहित्य-शिल्पी की होली पर अब तक की प्रस्तुतियाँ: होली विषयक कुछ प्रसिद्ध रचनाएं [विरासत] - अजय यादव होली है असत्य पर सत्य की विजय का पर्व [आलेख] - ललित गर्ग मुंशी प्रेमचंद की "प्रेम की होली" [विरासत] - राजीव रंजन प्रसाद लला फिर आईयो खेलन होली [आलेख] – ...
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Tag :
  February 27, 2015, 12:30 am
हम जो कह दें उसे मान जाया करो आईनों से जुबां मत लड़ाया करो खुद को खुद से बचाया करो दिन में तुम रात भर खुद को खुद पे लुटाया करो रचनाकार परिचय:- पेशे से पुस्तक व्यवसायी तथा इलाहाबाद से प्रकाशित त्रैमासिक ’गुफ़्तगू’ के उप-संपादक वीनस केसरी की कई रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिक...
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Tag :वीनस केसरी
  February 27, 2015, 12:00 am
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  गूगल के द्वारा अपनी रीडर सेवा बंद करने के कारण हमारीवाणी की सभी कोडिंग दुबारा की गई है। हमारीवाणी "क्...
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