| विरासत में 'अरुण प्रकाश' की कहानी 'भासा'बस पूरी तरह रुकी भी नहीं थी कि राजेश स्टॉप पर कूद पड़ा। उत्तेजना के मारे। वह जल्दी से जल्दी अपने कमरे में पहुंचना चाहता था। पूरा पढने के लियेयहाँ क्लिक करें।----------देस परदेस में ‘नाज़िम हिक़मत’ की ‘दिल का दर्द’अगर मेरे दिल का आधा हिस... |
| विरासत में अमरकांत की कहानी डिप्टी कलेक्टरशकलदीप बाबू कहीं एक घंटे बाद वापस लौटे। घर में प्रवेश करने के पूर्व उन्होंने ओसारे के कमरे में झाँका, कोई भी मुवक्किल नहीं था और मुहर्रिर साहब भी गायब थे। पूरा पढने के लिये यहाँ क्लिक करें।----------देस परदेस में ‘अन्तोन चेखव’ की ‘... |
| पुलिस का दारोगा ओचुमेलोव नया ओवरकोट पहने, बगल में एक बण्डल दबाये बाजार के चौक से गुजर रहा था। उसके पीछे-पीछे लाल बालोंवाला पुलिस का एक सिपाही हाथ में एक टोकरी लिये लपका चला आ रहा था। टोकरी जब्त की गई झड़गरियों से ऊपर तक भरी हुई थी। चारों ओर खामोशी।...चौक में एक भी आदमी नही... |
| गुमशुदा उम्मीदों की निशानदेही करती कविताएँअरुण कमल समकालीन हिंदी कविता साहित्य में एक प्रतिष्ठित नाम है. चार काव्य संग्रहों के सम्रद्ध रचना संसारके बाद “मैं हूँ शंख महाशंख” नाम से उनका पाँचवा काव्य संग्रह, राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है. प्रस्तुत काव्य संग्रह म... |
| गली रामनाथ में वह एकलौता बरगद का पेड़ था जो एक वीरान पड़ी मस्ज़िद की दरारों से होकर निकल आया था ------ और एक छोटे से बालक अली की पतंग उसकी टहनियों में फँस गई थी। बालक नंगे पाँव, फटी कमीज़ पहने सँकरी-सी पथरीली गली में दौड़ रहा था जहाँ एक अहाते के पिछले हिस्से में उसका दादा धूप म... |
| अगर मुझसे पूछा जाये कि सबसे ज्यादा राहत कब मिलती है तो ज्यादातर बार मेरा जवाब होगा जब कोई मुझे लिखने के काम से कोई थोड़ी सी मोहलत दे दे! मजेदार बात यह है कि लिखने का काम उन कामों में से है जो मैं सबसे कम किया करता हूं लेकिन जिनके बारे में सबसे ज्यादा सोचता हूं …मुझे हमेशा ल... |
| "भोर किरण!"1भोर किरणसूरज का सृजनधूप जीवन2नभ सागरतैरती चांदनी सीभोर किरण 3धूप उड़ानसूर्य की पहचानभोर किरण 4सूर्य कमलभंवरे सी है बंद भोर किरण5भोर किरणतितलियों सी आतीपंख पसारे 6स्व्सृजित सीज्वलित मशाल लेधूप बनाती 7पाखी सी उड़ेनव अरुणोदयभोर किरण 8सूर्य डाल पेकोयल सी कूकत... |
| वह बार-बार अपने प्रतिरूप को दर्पण में निहार रही थी... मन सपनों के नवीन नीड़ बनाने को आतुर था। वह पंछी की तरह आसमान में सुदूर उड़ जाना चाहती...इतनी ऊँचाई पर जहाँ से पृथ्वी का सब कुछ अदृश्य रहे...। उठी हुई तीखी नाक..इन्द्रधनुषी भवें ...लम्बी गर्दन ...वह सुन्दरता की प्रतिमूर्ति...। ... |
| मैं अपने बड़े भाई के पास 1993 में गोरखपुर गया हुआ था। ड्राइंगरूम में ही बैठा था कि दरवाजा खुला और एक भव्य सी दिखने वाली लगभग पैंतीस बरस की एक महिला भीतर आयी, मुझे देखा, एक पल के लिए ठिठकी और फ्रिज में छः अंडे रखने लगी। तब तक भाभी भी उनकी आहट सुन कर रसोई से आ गयी थीं। दोनों बातो... |
| आगाज़ तॊ होता है अंजाम नहीं होताआगाज़ तॊ होता है अंजाम नहीं होताजब मेरी कहानी में वॊ नाम नहीं होताजब ज़ुल्फ़ की कालिख़ में घुल जाए कोई राहीबदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं हॊताहँस- हँस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टुकडे़हर शख्स़ की किस्मत में ईनाम नहीं होताबहते हुए आँसू... |
| रूपसिंह चंदेल घुटनों तक सफेद लांगक्लाथ की बड़ी जेबों वाली कमीज, टखनों तक उठंग पायजामा और पैरों में चमड़े की चप्पलें…जब भी मैंने उन्हें देखा इसी वेशभूषा में. सप्ताह में लगभग तीन दिन सुबह सात बजे फतेहपुर-कानपुर शटल पकड़ने के लिए वह मेरे दरवाजे के सामने से गुजरते और श... |
| घास-पात और खोइया ग़ायबपोखर, ताल, तलैया ग़ायबकट गए सारे पेड़ गाँव केकोयल औ' गोरैया ग़ायबसूख गई है नदी बेचारीमाँझी चुप हैं, नैया ग़ायबसोहर, कजरी, फगुआ भूलेबिरहा, नाच-नचैया ग़ायबनोट निकलते ए टी एम सेपैसा, आना, पइया ग़ायबदरवाज़े पर कार खड़ी हैबैल, भैंस और गैया ग़ायबसुबह हुई ... |
| स्तंभ आओ धूप में इस बार प्रस्तुत हैं सजीव सारथी की कुछ गज़लें - मुखौटा पहचान लेता है चेहरे में छुपा चेहरा - मुखौटा।मुश्तैद है, तपाक से बदल देता है चेहरा - मुखौटा।कहकहों में छुपा लेता है, अश्कों का समुन्दर,होशियार है, ढाँप देता है सच का चेहरा - मुखौटा।बडे छोटे लोगों से, मिल... |
| मेरे पाठक हैं - मेरी ताकतएक दिन मैं बहुत उदास थी। उदास और बेचैन। उदास और बेचैन इस मायने में कि साहित्य की राजनीति और चापलूसी देखकर मुझे लग रहा था कि इस माहौल में लिखना, लिखते रहना... और फिर टिके रहना कितना मुश्किल है। मेरा कोई गॉड फादर नहीं है। आलोचकों का एक विशेष वर्ग अपने... |
| बदलते हुए मौसम का मिजाज़ जब से भू मंडल नहीं रहा भौगोलिकचढ़ गया है भूमंडलीकरण का बुखारजब से ग़ायब होना शुरू हुई उदारताफैला प्लेग की तरहउदारतावादजब से उजड़ गए गाँवों, कस्बों और शहरों केखुले मैदानों के बाज़ारघर-घर में घुस गया नकाबपोशबाज़ारवादयह अकारण नहीं कि तभी से प... |
| ....खून, मांस और गुलाबों की भाषाब्रिटिश कवि एवं लेखक स्टीफे़न स्पैण्डर से भारतीय लेखकों की बातचीत [प्रस्तुति - हेमंत शेष] न्यूयॉर्क, में 7 मई, 1967 को ब्रिटिश कवि एवं लेखक स्टीफे़न स्पैण्डर ने प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका ‘ऐनकाउण्टर’ के लेखक-सम्पादक-पद से इस्तीफ़ा दे दिया था... |
| कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिएकहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिएयहाँ दरख़तों के साये में धूप लगती हैचलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए। न हो कमीज़ तो पाँओं से पेट ढँक लेंगेये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए।ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सहीकोई हसीन नज़ारा ... |
| [देस-परदेस] - हेनरिख सेन्केविच - विश्व कथाकार -पोलैंड (1848-1916)उपन्यासकार और लघु कथाकार हेनरिख सेन्केविच का जन्म एक कुलीन परिवार में पोलैंड में 'वोला ऑकरेजेस्का' नामक स्थान में हुआ था. पोलैंड उन दिनों रूसी आधिपत्य में था. आर्थिक परेशानियों के चलते उनका परिवार वारसा में ... |
| साहित्य शिल्पी का चौथा अंक आपके सामने हैं। हम आप सब पाठकों के आभारी हैं कि आपने साहित्य शिल्पी को नये रूप में पसंद किया है। पहले जहां इस पत्रिका को लगभग 700 से 1000 के बीच हिट प्रतिदिन मिलते थे, आजकल यह संख्यां 1500 प्रतिदिन से ऊपर जा पहुंची है। हालांकि हम किसी भी तरह की टीआरपी क... |
| क्रांतिकारी सोच वाले सआदत हसन मंटो की बेटी कहती हैं कि वो मज़हबी बिल्कुल नहीं थे, लेकिन कहानी शुरू करने से पहले उनका 786 लिखना दिलचस्प लगता था। लेकिन उनकी क्रांतिकारी सोच और अतिसंवेदनशील लेखनी से 'मंटो' के रूप में उन्हें पूरी दुनिया में शोहरत मिली।पैदाइशी अफसानानिगार ... |
| बीती ग्यारह मई को मंटो का जन्मदिन था। वे होते तो सौ बरस के होते। लेकिन इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वे महज 42 बरस जीये। लेखक वैसे भी न तो मरता है और न ही अपने पाठकों की स्मृतियों से दूर ही जाता है। पिछले दो दिन से सब जगह यही पढ़ रहा हूं कि वे होते तो और धमाकेदार लिखते रह... |
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January 22, 2012, 7:00 am |
| रंगो खुश्बू फालतू, आबो हवा बेकार हैचाराग़र हो बेइमां तो हर दवा बेकार हैमोमिनों में आजकल ये बहस भी चलने लगीये खुदा बेकार है या वो खुदा बेकार हैलट्ठ के आगे लॅंगोटी खुल गई तो क्या कहेंमुद्दई बेकार है या मुद्दआ बेकार हैहम अज़़ल से जी रहे हैं तीरग़ी के खौफ मेंबोलिये मत हाल य... |
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January 20, 2012, 7:00 am |
| वसुधा अपनी पड़ौसन मिसेज रेड्डी से बात कर रही थी तभी उनका बेटा पप्पू भागता हुआ आया --"मम्मी आपके किचन में एक छिपकली घुस आई है,भगा दूँ वरना कहीं खाने में न गिर जाये ।'"छिपकली कहाँ से आ गई.. सब खिड़की दरवाजों पर तो जाली लगी है ।'"जरूर आपकी काम वाली ने पोछा लगाते समय दरवाजा खुला छ... |
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January 19, 2012, 7:00 am |
| फिर से उड़ने लगें है झंडे फिर से नारे बाजीफिर से होने लगी मिल कर वोट की सौदे बाजी कहीं बिकेगी बस बोतल में कहीं नोट की गद्दी इस से ही बदलेगी निश्चित कुछ लोगों की बाजी ||मंहगाई और भ्रष्ट आचरण जैसे मुद्दे छोड़े जाये दश भाड़ में सब ने इस से नाते तोड़े हल हो जाये अपना मतलब ये ही ... |
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January 18, 2012, 7:00 am |
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