'विचार प्रवाह'

बहुत याद आये है वह गुजरा जमाना .....!वो चाय की प्याली और तेरा रूठ जाना |रूठने मनाने के झगड़े में वो तेरा चेहरे पर से जुल्फों को हटाना ....!बहुत याद आये है वह गुजरा जमाना .....!वो भागते हुए तेरा ट्रेन पकड़ना और पानी की बोतल घर भूल जाना वो फोन की ट्रिंग ट्रिंग वो तेरा ...
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  October 1, 2013, 3:58 pm
जो रफ़्तार में थेउन पीले गुलमोहरों परबैठी तितली को ना देख पाए ।ना छू पायें उस ऒस की बूँद को ,जो सुबह सुबह घास के आखिरी छोर पर टिकी थी ।जो रफ़्तार में थेमूंगफली के दानों को कुतर कुतर कर खाती उस गिलहरी को पीछे छोड़ गये ,घर की बालकनी में रखा तुलसी का पौधा सूख रहा है ।पिज़्ज़ा ...
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  September 23, 2013, 6:30 pm
उस फिसलन भरे समय में तुम्हारा आना भी , आभासी चादर ओढ़े किसी अप्रत्याशित घटना से कम ना था | कातर आवाजों और चीत्कारों के बीच वह पल अँधेरे में जुगनू सी चमक और अनदेखे सपने दे गया था | शायद पहली बार तुम्हे महसूस करने का क्रम शुरू हुआ था , जोकि अनवरत चलता रहेगा , कभी सोचा ना था | कतर...
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  August 5, 2013, 7:18 pm
बहुत समय बाद महा देवी जी की मेरा परिवार पुनः कांपते हाथों से पढने को उठाई । (कांपते हाथों से उठाने का अभिप्राय शायद अनुभूतियों की तीव्रता से उत्पन्न बेचैनी को ना झेलने की मन: स्थिति ही हो सकती है ।) बढ़ते हुए पन्नों की संख्या के साथ बचपन की मीठी स्मृतियाँ चलचित्र की भांत...
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  July 28, 2013, 12:18 pm

Gh gteedccv hjhh ...
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  May 21, 2013, 11:09 am
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  May 21, 2013, 11:09 am
यार –तुम लड़के .......क्यों नहीं किसी एक के हो पाते हो ....बस –भवरें की तरह ,हर फूल पर मंडराते हो .....!या कुछ यूँ कहूँ ...जो भी किसी एक का ना हो पायेगा ,जीवन भर उस भूत की तरह किसी अँधेरे कुएं से निकलने की आस में अकेले फड़फड़ायेगा .....सुकून ना मिल पायेगा ....सुकून ना मिल पायेगा .....!!!!!!प्रियंक...
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  March 28, 2013, 3:56 pm
जब पड़ा था पहला कदम तुम्हारा मेरे आँगन में ,तब -वो फूल  ही तो थे पलाश के ,जो बिखरे थे मेरे आँचल में ......!!!!!प्रियंका राठौर ...
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  March 4, 2013, 7:31 pm
शब्द। मैं नहीं जानती कि कहां से आते हैं। एक लेखिका जो वेदना में है। शायद, इस अवस्था में पुन: जीने की इच्छा एक शरारतभरी इच्छा है।अपने 90वें वर्ष से बस थोड़ी ही दूर पहुंचकर मुझे मानना पड़ेगा कि यह इच्छा एक संतुष्टि देती है, एक गाना है न 'आश्चर्य के जाल से तितलियां पकड़ना..' इसक...
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  January 25, 2013, 3:04 pm
रचने चली हूँ फिर एक संसार ...जिसमे है -वो टिमटिम आँखों वाली दुबली पतली बार्बी ...साथ खड़ा वो मासूम हरा श्रैक .....न जाने कहाँ से .आया टॉम यहाँ पर शायद कर  रहा है पीछा प्यारे जैरी का ....ये क्या !काकश ने पीछे से आकर  खाया है  काट मेरे गोलू श्रैक  को ..गोल गोल सी आँखों में अब मोटी मोटी...
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  January 24, 2013, 7:41 pm
हाल का टीवी आन था ... अमिताभ बच्चन का इन्टरव्यू चल रहा था और अमिताभ मधुशाला की कुछ पंक्तियाँ सुना रहे थे .... पारु उधर से गुजरी ... पंक्तियाँ सुनते ही बुदबुदाई “आई हेट अल्कोहल .... पता नहीं लोग , इस पर क्यों लिखते हैं .... दुनिया में टॉपिक कम हैं क्या ?”तभी पीछे से आती आवाज ने उसकी तन्...
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  January 10, 2013, 6:19 pm
मै  नहीं जानती .....कि  दुनिया में क्या हो रहा है ,या क्या घट रहा है ....मै  नहीं जानती .....कि  अमेरिकी तट  पर आया हरिकेन क्यूँ आया .....मै नहीं जानती कि लोग उसे सैंडी क्यूँ कह रहे हैं .....या फिर ओबामा और रोमनी में कौन अमेरिकी सत्ता संभालेगा ......मै  नहीं जानती .....कि आर बी आइ की नीति के उत...
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  October 30, 2012, 7:33 pm
ख़ामोशी की सूनी चादर में ,शब्दों का मिलना -तेरा होना ही तो है .....अंगडाई लेती धूप में ,फूलों का खिलना -तेरा होना ही तो है .....हवा की ठंडक का कानों में आकर कुछ कह जाना -तेरा होना ही तो है .....बहते जल में लहरों का आलिंगन -तेरा होना ही तो है .....और क्या कह दूँ -छूटती हुयी जिन्दगी में ,उम्...
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  October 17, 2012, 1:26 pm
तज दियो है लाल रंग ,उजलों ही अब भाए रे ,धूल धूसर में भी लाग्यो रे चोखा ,म्याहरे शिव भी उसमे समाये रे ,सब रंगों का है एक रंग ये ,उजलों ही अब भाए रे .....हाँ –उजलों ही अब भाए रे ......!!!![उजलों = सफ़ेद ]प्रियंका राठौर ...
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  August 15, 2012, 12:40 pm
मै 'असम 'भारतीय संस्क्रति का सिरमौर 'असम ' ..................आज -जलता , झुलसता असम  बन गया हूँ ...................दर्द की कतरनों से कई सवाल जेहन में उभर रहे हैं ....हिंसा के इस दौर को मै क्या  नाम दूँ ?क्षेत्र विशेष समस्या या फिर साम्प्रदायिकता ......अतीत के गोल - गोल छल्लों में जब अ...
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  July 27, 2012, 8:26 pm
मै 'असम 'भारतीय संस्क्रति का सिरमौर 'असम ' ..................आज -जलता , झुलसता असम  बन गया हूँ ...................दर्द की कतरनों से कई सवाल जेहन में उभर रहे हैं ....हिंसा के इस दौर को मै क्या  नाम दूँ ?क्षेत्र विशेष समस्या या फिर साम्प्रदायिकता ......अतीत के गोल - गोल छल्लों में जब अपना प्रतिबिम्ब देख...
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  July 27, 2012, 8:26 pm
जिस्म बिकता है बाजारों में भी .......उसकी चुकानी पड़ती है कीमत .......एक 'इमोशन लेस' 'यूज'और फिर 'थ्रो'उसमें वो बात कहाँ .......बुझाने गए थे आग खुद झुलस कर  चले आये .....अब क्या -अन्दर की सुलगती आग को शांत कैसे किया जाये ?नया दांव -'इमोशनल' प्रपंच का ,जिस्म तो जिस्म है ,आंगन का हो तो सबसे बेह...
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  July 25, 2012, 3:45 pm
उस गहरी , काली ,अभिसप्त सी ,दिखने वाली ,बाबी का .....वह निश्तेज ,मरणासन्न सा सांप -अभी मरा नहीं है ......बस  -प्रतीक्षा में है मुक्ति की ....पल पल मरती पुरानी  जिन्दगी से .....केंचुल उतरने की ,प्रक्रिया जारी  है ....दर्द , तड़प और कराहों का चीत्कार उसको बेबस जरूर कर रहा है .....लेकिन -नष्ट न...
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  July 1, 2012, 2:58 pm
वक्त  के चेहरे पर फेकी हुयी रंगीन स्याही सी ,7गुणा 7 नाप की चाँद की तस्वीर ,तुम्हारे दिल के फ्रेम में ऐसी फिट है जिसमे कम या ज्यादा की कोई गुंजाईश नहीं .......मगर अफ़सोस -उन रंगों को देख पाना तुम्हारे लिए मुमकिन नहीं -क्योकि -तुम्हारी नजरें सिर्फ श्वेत श्याम ही ,देख पाती  है...
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  June 22, 2012, 2:39 pm
अनिश्चितता की भी सीमा होती है ....अनुमानों का गुबार या फिर स्थायित्व  के खरे मापदंड दिशा सूचक रूप में अनिश्चितता को भी निश्चित स्थापित करते हैं ....जुएँ के पत्ते तभी तक अनिश्चित होते हैं जब तक बिना बांटें गड्डी के रूप में नियति के हाथ होते हैं ...खिलाड़ियों के बीचबँट जा...
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  April 26, 2012, 3:52 pm
तुम्हारा साथ देने को पलों को थाम लिया है ....कुछ बची हुयी तुम्हारी अनकही बातें सुनने  को पलों को थाम लिया है ....दिया है वक्त अब और तुम्हे तुम्हारे सपनों को पूरा करने की ख्वाहिश में पलों को थाम लिया है ....फिर कभी मिलेंगे हम जीवन की सच्चाई को आत्मसात करइस अरमान को लिए दिल मे...
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  April 24, 2012, 6:11 pm
गयी थी लाने उपहार तुम्हारा ....सामानों की भीड़ में ढूंढ सकी न कुछ ....फिर सोचा -क्यों ना तुमको चाँद ही दे दूँ ,लेकिन एक चाँद को दूजे चाँद की जरूरत  क्या ....फिर सोचा -क्यों ना तुमको सूरज  दे दूँ ,लेकिन तुम्हारे ओज के आगे उस सूरज की चमक ही क्या ....फिर सोचा -क्यों ना तुमको पूरा आसमां ...
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  April 21, 2012, 8:18 pm
भावनाओं  की आग में जल शिखर सागर बन धरा पर फ़ैल गया ......अब वह -गहरा हो चला था ....विस्तृत हो चला था ....हर आग को खुद में समां लेने में सक्षम था ........झुलसते हुए अंगारों और शोलों को खुद की गहराई में अन्दर तक ले जाना फिर शांत भाव से काले हीरे में बदल देना उसकी पहचान हो गयी .......लेकिन -फ...
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  April 2, 2012, 8:21 pm
कभी उलझावों के समंदर में डूबने लगती हूँ ... तो अपने चिर परिचित प्रांगण में जाती हूँ .... आज फिर गयी थी .... घुमड़ते हुए सवालों के जबाब ढूंढने ..... वहाँ कुछ भी तो नहीं बदला ... वही मूर्तियां थीं ... वही खनकते हुए घंटों की आवाजें ..... बस साज सज्जा पहले से और बेहतर हो गयी थी .... कदम बढ़ रहे थे ......
'विचार प्रवाह'...
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  March 17, 2012, 8:57 pm
शरीर को सूरज की तपिश झुलसा रही है ....बनते हुए जख्मों से खून का रिसना बदस्तूर जारी है ....कदम बढ़ना चाहते हैं ,लेकिन -चाहकर भी बढ़ नहीं पाते....आह !शरीर धराशायी हो गया ....चेतना लुप्त  हो रही है ....अरे !कुछ दिख रहा है ,धुंधला सा -वो कवच ही है नाजो टूट करमिट्टी में मिल चुका है....जीव दू...
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  March 12, 2012, 12:27 pm
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