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शिप्रा की लहरें

( अपनी मित्र कल्पना की एक कविता यहाँ प्रस्तुत करने का लोभ नहीं संवरण कर पा रही हूँ. - प्रतिभा. )* मैं नहीं रोई , तुम्हारा दृष्टि भ्रम होगा.अचानक यों उमड़ कर क्यों  हृदय  आवेग धारेगा,किसी भी भावना के बस, उचित-अनुचित विचारेगामनस् की चल तरंगों का सरल उपक्रम रहा होगा. तुम्...
शिप्रा की लहरें...
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  August 20, 2017, 10:45 am
.*चल रे हर सिंगार तुझे मैं साथ ले चलूँ. चंदन कुंकुंम धारे तरु डालों पर जगतीं दीप शिखाएँ  ,संध्या के रोशमी पटों में शीतल सुरभित श्वास समायेइस जीवन से माँग-जाँच कर थोड़ा-सा मधुमास ले चलूँयह उल्लास भरा उत्सव-क्रम मधुवर्षी लघुतम जीवन का किसी  प्रहर को रँग से भऱ  दे , उ...
शिप्रा की लहरें...
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  August 14, 2017, 9:59 am
*कूड़े के ढेर परबिखरा पड़ा कितना सामान,किसी ज्योनार का फिंका खाना तमाम.जूठन लगी पेपर प्लेटें,पिचकी बोतलें, गिलास,पालिथीन की ,मुड़ी-चुड़ी थैलियाँ .और बहुत-कुछ एक  साथ.मक्खियों के संगमँडराती खट्टी-सी गंध.*दो बच्चे ,उम्र आठ-दस बरस ,कंधे पर झोली टाँगे ,छडी़ से मँझा रहे हैं...
शिप्रा की लहरें...
Tag :ज्योनार
  July 1, 2017, 6:03 am
* थक गई है माँ , उम्र के उतार पर लड़खड़ाती, अब समय के साथ चल नही पाती . बेबस काया परबड़प्पन का बोझ लादे,झुकी जा रही है माँ. *त्याग के, गरिमा के ,पुल बाँधे,  चढाने बैठे हैं लोग पार नहीं पाती,  घिसी-गढ़ी मूरत देख अपनी जड़ सी हो जाती मा्ँ, दुनिया के रंग बूझती च...
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Tag :झुराती
  June 5, 2017, 1:36 am
हे ,भगवान  !तूने उसे माँ होने का वरदान दिया , अच्छा किया . सृष्टि का तारतम्य चला . तूने विशिष्ट बनाया  नारी को  यहीं से शुरू हो गया दोहन ,दाँव चढ़ गया सारा जीवन . * करती रही धर्म मान मातृत्व का निर्वहन. पलते-समर्थ होते पकड़ते अपनी राह . रह जाती ढलती - छीजती,&nbs...
शिप्रा की लहरें...
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  May 17, 2017, 11:04 am
 बेटी ,माँ बनती है जबसमझ जाती है.अब तक,माँ से सिर्फ पाती रही थी -लाड़-चाव,रोक-टोक नेह के उपचार, विकस कर कली से फूल बन सके.देखती  व्यवहार, जीने के  ढंग ,माँ थोड़ी मीठी,थोड़ी खट्टी. समझदार हो जाती है बेटी ,माँ बन कर .बहुरूपिया है माँ ,कितने रूप धरती है, पढ़ लेती सबके मन ...
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  May 15, 2017, 3:10 am
*ब्राह्मी से उद्भव ले विकसे जो देवनागरी के आखऱ, अक्षर अक्षरशः सार्थक हैं, पीढ़ी-पीढ़ी का वैभव भर. यह परम-ज्ञान संचय की लिपि, रच आदि-काव्य गरिमा मंडित.ऋषि-मुनियों की संस्कृति संचित, हो विश्व निरामय संकल्पित.मानव वाणी का यह चित्रण, धारे सारे स्वर औ'व्यंजन , अवयव सम्मत ...
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Tag :ग्रथित
  April 20, 2017, 12:13 am
*स्त्रियाँ भी रोग झेलती हैं ,बूढ़ी होती , मर जाती हैं .कुछ नहीं कहतीं;सब की सुख-सुविधा का दायित्व निभाते ,एक दिन ,चुपचाप संसार से बिदा हो जाती हैं.*सुहागिन मरी:बड़े भागोंवाली थी,(क्वाँरी के भागों सुहागिन मरती है न!)विधवा मरी: चलो छुट्टी हुई. कुँवारी मरी: अरे ,एक बोझ हटा सिर...
शिप्रा की लहरें...
Tag :भतार
  April 9, 2017, 12:01 am
ये मेरे भारत के सपूत अब हिन्दी पढ़ना भूल गए , हिन्दी की गिनती क्या जाने, वो पढ़े पहाड़े भूल गए !सारे विशेष दिन भूल गए त्यौहार कौन सा कब होता,क्रिसमस की छुट्टी याद कि जैसे पट्टी पढ़ लेता तोता ,लल्ला-लल्ली से ज्यादा अपने लगते हैं पिल्ला-पिल्ली ,अंग्रेजी,असली मैडम है ,हिन्द...
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Tag :ज़ुबानी जमा-खर्च.
  March 11, 2017, 8:58 am
*मरणमय देह लेकर मैं तुम्हारी अंशिका हूँ माँ *अनेकों  नाम  अनगिन रूप धर  मैं ही प्रवर्धित हूँ जहाँ तक क्रमित संततियाँ वहाँ तक मैं प्रवर्तित हूँ अनेकों पात्र रच-रच मैं जगत के मंच पर धरती हुई अनुस्यूत सब में ही पृथक् अस्तित्व धर कर भी,तुम्हारी लोल लीला की अनुकृ...
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  March 9, 2017, 1:02 am
*तुम बार-बार क्यों लौट  रही हो सर्दी ,कोहरा तो भाग गया , दे अपनी अर्जी.*गद्दे रजाइयाँ सभी खा चुके धूपें ,बक्से में जाने से बस थोड़ा चूकेहमने भी अपनी जाकेट धो कर धर दी,तुमने यों आकर कैसी मुश्किल कर दी.*ये तीन महीने बीते सी-सी करते,अब जाकर तन के बोझ हुए थे हलके,सुबहों  में जल्...
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  February 18, 2017, 10:57 am
घास हँसती है .*ओस की बूँदें बिछा राँगोलियाँ पूरीं ,हरित पट पर लिख दिये नव-रूप  के अंकन महकता चंदन लगा  पुलकित पराग धरे,  पूर  चुटकी से कहीं हल्दी कहीं  कुंकुंमसूर्यमुखियों के बहुत लघु संस्करण हुए , छत्र साजे  पीतवर्णी पाँखुरी मंडल खिल उठे अनयास इस एकान्त की ल...
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  February 8, 2017, 10:09 am
*नया वर्ष मन में उछाह भरे ,पथ के अवरोध हरे .सन्मति से भरे लोक .जागे कल्याण बोध शान्तिमय हुलास का प्रकाश चहुँ ओर झरे !*...
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  January 1, 2017, 2:08 am
उस पुराने जर्जर होते नक़्शे से एक नई तस्वीर बन रही है -चल रहा है  नवोदय का अनुष्ठान !*पुनर्निर्माण पूर्व की अवश्यंभावी उठा पटक.हट जाये कूड़-कबाड़,सदियों की जमी हुई कलौंच छुटे ,दाग-धब्बों से रहित धुंध -धूल से स्वच्छ ,निर्मल हो थल-जल-मनस्तल .*खलल पड़ेगा बहुतों के आ...
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  November 19, 2016, 9:54 am
*इस भू-लक्षमी् की पूजा में तत्पर हो , जो दीप जग रहे सरहद की देहरी पर ,वे दूर-दूर तक रोशन करें दिशायें ,जन-जन के उर की  स्नेह -धार से सिंच कर  .नव ऊर्जा से आवेगित  स्फीत  शिराएँ ,सामर्थ्य-शौर्य की गूँजें नई कथायें जय-श्री दाहिने हस्त ,विघ्नहर संयुत,  हो वाम पार्श्व म...
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  October 31, 2016, 5:24 am
*(  मजहब की है क्या शर्त यही - तुम जियो ,सभी का कर विनाश ?) धिक्कार नं. 1.तोड़ा घर बाँटे आँगन  जब बाप कर लिये दूजेअनजानी गैरों की  धरती को तीरथ कह पूजे  गर्भनाल इनके अपने बापों की अब भी जहाँ गड़ी है    हीन मनों में उस धरती के प्रति यों घृणा भरी है  . पुरखों को नकार &nbs...
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  October 22, 2016, 4:48 am
तप-तप कर हो गई  अपर्णा, जिनके हित नगराज कुमारी ,कहाँ तुम्हारे पुण्य-चरण ,मैं कहाँ ,जनम की भटकी-हारी!*कहीं शान्त तरु की छाया में बैठे होगे आसन मारे,मूँदे नयन शान्त औ'निश्छल , गरल कंठ शशि माथे धारे ,और जटाओं से हर-हर कर झरती हो गंगा की धारा ,मलय-पवन-कण इन्द्रधनुष बन करते हों अभि...
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  October 13, 2016, 9:24 am
(मातृभूमि की रक्षा में सतत तत्पर हमारे वीर जवानों के लिये जब कोई आपत्तिजनक भाषा बोलता है तो अंतर उद्वेलित हो उठता है. इस देश की प्रत्येक माँ के हृदय  में अपने व्रती पुत्रों के प्रति जो भाव उमड़ते हैं उन्हें व्यक्त करने का एक प्रयास है यह कविता ..)मातृभूमि के वीर जवानों स...
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  October 4, 2016, 9:54 am
*क्या  शब्द था - दिव्य !!!जैसे प्रसन्न आकाश , मुक्त,भव्य ,असीम .कितना सार्थक दीप्त त्रुटिहीन .अर्थ का अनर्थ ,घोर अपकर्ष ,कैसी  मनमानी वंचना शब्दों से ,कर डाला ,अपूर्ण ,विकल , विहीन.* संज्ञा बदलने से गौरव  नहीं मिलता,   बिंब-प्रतिबिंब-सा है  दृष्य और दृष्टि का संबंध .प...
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Tag :छीछालेदर
  September 13, 2016, 10:38 am
( यह कविता प्रस्तुत करते मन में संशय है कि कोईआद्यन्त पढ़ेगा भी  .फिर भी  ब्लाग है मेरा , यहाँ अंकित करूँगी तो ही ...)* कवि,महाकाल ,माँगता नहीं मृदु-मधुर मात्र , सारे स्वादों से युक्त परोसा वह लेगा. भोजक, सब रस वाले व्यंजन प्रस्तुत कर दे अपनी रुचि का वह ग्रास स्वयं ही ...
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Tag :उत्ताप
  August 22, 2016, 10:49 pm
*स्वर्ण मुक्ता रतन की ठनक है बहुत ,काँच की चूड़ियों की खनक और है .मोल उनका बज़ारों में खुल कर लगे ,पाप इनके लिये  दूसरा ठौर है .*झिलमिली सी झनक में बिखरती लहर सी ,तरंगित तरल-सी मधुर व्यंजना. रेशमी रंग की पारदर्शी दमक पर सँभल कर कि कस कर पकड़ना मना .*टूटने का ,बिखरने का, चुभने...
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  July 13, 2016, 11:10 pm
* प्रेम की परिकल्पना राधा ,जहाँ कोई भी न भव बाधा !भावना सशरीर, मर्यादा अभौतिक,गहनतम अनुभूति की यह डूब , मग्नता का कहीं ओर न छोर.बिंब औ'प्रतिबिंब दोनों एक , राग की अभिव्यंजना राधा !*विरह पलती  प्रेम  की गाथा ,निविड़ उर- एकान्त ने साधा.सम समर्पण जहाँ दोनों ओर, शेष रह जाता अर...
शिप्रा की लहरें...
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  July 8, 2016, 2:14 am
* नहीं, मैं नहीं एकान्त निर्मात्री, इस सद्य-प्रस्फुट जीवन की, रचना मेरी, आधान तुम्हारासँजो कर गढ़ दिया मैंने नया रूप .प्रेय था!पौरुष का माधुर्य छलक उठा जबनयनों में वात्सल्य बन, जैसे चाँदनी में नहाई बिरछ की डाल, स्निग्ध कान्ति से दीप्त तुम्हारा मुख!मुग्ध हो गई मैं .कृतज्ञ ...
शिप्रा की लहरें...
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  June 19, 2016, 10:13 pm
(नारी लेखन पर बड़े-बड़े सवाल उठते हैं - चुनौतियों और संभावनाओं की बातें होती हैं . लेकिन कुछ मूल-भूत प्रश्न  हैं जिनके उत्तर कभी नहीं मिलते ,...और समाधान मिले बिना समस्या जहाँ की तहाँ... .)  रचनात्मकता का पर्याय है नारी , प्रकृति ने दिया सृजन का वरदान - नेहामृत से सींच  ,भाव...
शिप्रा की लहरें...
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  May 3, 2016, 1:27 pm
* गौरी-शंकर का विवाह संपन्न हो चुका .आगत अतिथि प्रस्थान कर गये .पर हिमगिरि और मैना निवृत्त कहाँ  -कन्या बिदा नहीं हुई अभी .पूरा बरस  बीत चुका .दूल्हा शंकर कोहबर में ऐसा रमा  कि बाहर निकलता ही नहीं  .सारी बरात टिकी है .कैसे हो  प्रस्थान ! पर्वतराज लाचार  ,झींकभरी मै...
शिप्रा की लहरें...
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  April 8, 2016, 2:03 pm
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