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स्वर-यात्रा : View Blog Posts
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स्वर-यात्रा

उन्नयन (UNNAYANA): माँ तुझे प्रणाम !माँ के बिना कोई काम नहीं चलता जब भी ज़रूरत हो वही याद आती है!...
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  May 12, 2013, 7:59 am
*बीतते बरस लो नमन !*जुड़ गया एक अध्याय और ,गिनती आगे बढ़ गई ज़रा ,जो शेष रहा था कच्चापन ,परिपक्व कर गए तपा-तपा .आभार तुम्हारा बरस ,कितोड़े मन के सारे भरम !*फिर से दोहरा लें नए पाठ,दो कदम बिदा के चलें साथ .बढ़ महाकाल के क्रम में लो स्थान ,रहे मंगलमय यह प्रस्थान !चक्र घूमेगा कर निष...
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Tag :बीतते बरस
  December 28, 2010, 2:21 am
*( माँ भारती अपने पुत्रों से भिक्षा माँग रही है- समय का फेर !)रीत रहा शब्द कोश ,छीजता भंडार ,बाधित स्वर ,विकल बोलजीर्ण वस्त्र तार-तार .भास्वरता धुंध घिरी दुर्बल पुकार नमित नयन आर्द्र विकल याचिता हो द्वार-'देहि भिक्षां ,पुत्र ,भिक्षां देहि !'*डूब रहा काल के प्रवाह में अनंत कोश ,...
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  November 11, 2010, 11:30 am
एक सीमा है हर रिश्ते की , एक मर्यादा ,एक पहुँच!बस वहीं तक निश्चित- निश्चिन्त. शोभनीय -सुरुचिमय . प्रसन्न और सुन्दर ! * इसके आगे कोरा छलावा . विकृत, सामंजस्यहीन , दुराव-छिपाव का ग्रहण , शंकाओं का जागरण.क्योंकि अस्लियत मन जानता है ,कोई जान सकता भी नहीं. अवशिष्ट अपराध-बोध , अंतरात्...
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  October 19, 2010, 9:37 am
*शैशव की लीलाओँ में वात्सल्य भरे नयनों की छाँह तले ,सबसे घिरे तुम ,दूर खड़ी देखती रहूँगी .यौवन की उद्दाम तरंगों में ,लोकलाज परे हटा ,आकंठ डूबते रस-फुहारों में जन-जन को डुबोते ,दर्शक रहूँगी ,कठिन कर्तव्य की कर्म-गीता का संदेश कानों से सुनती-गुनती रहूँगी .*लेकिन ,जब अँधे-युग क...
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  October 2, 2010, 6:37 am
कथा एक -*इन  भीड़ भरी राहों की गहमा-गहमी में  हर ओर पथिक   मिल जाते हैंआगे-पीछे ,दो कदम साथ कोई कोई चल पाता पर हँस-बोल सभी  जा लगते अपने ही रस्ते. अपनी गठरी की गाँठ न कर देना ढीली ,नयनों में कौतुक भर  देखेंगे सभी लोग ,चलती-फिरती  बातें काफ़ी हैं आपस की ,औरों  के किस्से जाने सबको ...
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  September 7, 2010, 12:28 am
*इन  भीड़ भरी राहों की गहमा-गहमी में  हर ओर पथिक   मिल जाते हैंआगे-पीछे ,दो कदम साथ कोई कोई चल पाता पर हँस-बोल सभी  जा लगते अपने ही रस्ते. अपनी गठरी की गाँठ न कर देना ढीली ,नयनों में कौतुक भर  देखेंगे सभी लोग ,चलती-फिरती  बातें काफ़ी हैं आपस की ,औरों  के किस्से जाने सबको बड़ा शौ...
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  September 6, 2010, 11:11 am
*(स्वतंत्रता के बाद पहले महाकुंभ के अवसर पर ऐसी अव्यवस्था हो गई  कि भीड़ में अँधाधुंध भागदड़ मच गई और बहुत लोग गिर-गिर कर रौंदे जाते रहे -अधिकारी वर्ग पं. नेहरू के स्वागत में व्यस्त था.तब लिखी गई थी यह  - कुंभ-कथा)*मानव के यह आँसू शायद सूख चलें पर ,मानवता के अश्रु-लिखित यह करु...
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  August 19, 2010, 6:23 am
*आज सूरजरोज से कुछ देर से निकला !लो ,तुम्हारी हो गई सच बात ,सूरज देर से निकला !*कुछ लगा ऐसा कि लम्बी हो गई है रात ! और रुक सी गई ,तारों की चढी बारात .धीमी पड गई चलती हुई हर साँससूरज देर से निकला !*घडी धीरे चल रही ,कुछ सोचता सा कालधर रहा है धरा पर हर पग सम्हाल-सम्हाल !बँधा किसकी बाँह ...
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  August 8, 2010, 12:35 am
**जब न मैं होऊ ,बताओ क्या करोगे १ नए ढँग से ज़िन्दगी का हर पहाड़ा , बहुत श्रम से सीखना होगा दुबारा इसलिए कुछ धैर्य धर शुरुआत कर लो ,भंग होगा क्रम जहाँ मेरा -तुम्हारा !कौन समझेगा ,अकेले ही सहोगे !*मुझे अब कोई भनक लगने लगी है ,कान में कुछ वंशियाँ बजने लगी हैं ,दूर के कुछ स्वर सुनाई...
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  July 25, 2010, 10:19 am
*कौन गति !एक नन्हीं-सी ज्योति !माटी में आँचल में अँकुआता बीज !काल -धारा में बहे जा रहे जीवन को निरंतरता की रज्जु में बाँधता,भंगुर-से तन में सँजोए नवनिर्माण कण काल से आँख मिलाती नव-जीवन रचतीधरती या नारी ?*उस अंतर्निहित ज्योति का स्फोट दर्पण पर प्रतिवर्तित असह्य प्रकाश ! स...
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  July 2, 2010, 10:07 am
चिट्ठी के एक ही पृष्ठ से मैं पूरी गाथा पढ़ जाऊं ! नेह तुम्हारा पा ,जाने क्यों उमड़-उमड़ आता मेरा मन ,बड़े बंधु के आगे जगता ,छोटी सी बहिना का बचपन !इस कमरे में जहाँ बैठ कर पढ़े जा रही तेरे आखर ,हर कोने में लगता जैसे नया उजास छा गया आकरजाने क्यों आँखें भऱ आईं कोई पूछे क्या समझ...
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  June 15, 2010, 8:32 am
*बहुत दिन हो गए नदिया बड़ी संयत रही है .लहर के जाल में सब-कुछ समाए जा रही है .कहीं कुछ शेष बचता ,जमा बैठा जो तलों में .बहुत दिन से न जागा वेग मंथर वह रही बस प्रवाहित मौन सी चुपचाप धारा ,समेटे जाल सारे, डुबोए जल में समाए .कहीं बरसा न पानी ,हिम-शिखर पिघला न कोई उमड़ने दो बहुत दिन हो...
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  June 10, 2010, 7:54 am
*हे,मातृ रूप हे विश्व-प्राण की प्रवाहिका हे नियामिका वह परम-भाव ही इस भूतल पर छाया बन करुणा-ममता केवल अनुभव-गम्या, रम्या धारणा-जगतके आरपार तुम मूल सृष्टि नित पुष्टि हेतु सरसा जीवन की अमियधार *इस अखिल सृष्टि के नारि-भाव उस महाभाव के अंश रूपउस परम रूप की छलक व्यक्त नारी-मन ...
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  May 9, 2010, 4:31 am
केवल तुम्हारी थी थोड़ा-सा आत्म-तोष चाहता रहा था मनपीहर में पति- सुख पा इठलाती बाला बन मन में उछाह भर ताज़ा हो जाने का ,बार-बार आने का अवसर, सुहाग-सुख पाने का .*थोड़ा सा संयम ही चाहा था रत्ना ने ,भिंच न जाय मनःकाय थोड़ा अवकाश रहे,खुला-धुला ,घुटन रहित ,नूतन बन जाएपास आने की चाह .*...
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  May 5, 2010, 10:47 am
* ' यह संस्कृति का वट-वृक्ष पुरातन-चिरनूतन कह 'चरैवेति' जो सतत खोजता नए सत्य जड़ का विस्तार सुदूर माटियों को जोड़े निर्मल ,एकात्म चेतना का जीवन्त उत्स,*आधार बहुत दृढ़ है कि इसी की शाखाएँ मिट्टी में रुप कर स्वयं मूल बनती जातीं,जिसकी छाया में आर्त मनुजता शीतल हो चिन्ताधारा ...
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  April 30, 2010, 11:22 am
*हर घर में कुछ कुठरियाँ या कोने होते हैं जहाँ फ़ालतू कबाड़ इकट्ठा रहता है ।मेरे मस्तिष्क के कुछ कोनो में भीऐसा ही अँगड़-खंगड़ भरा है ।जब भी कुछ खोजने चलती हूँ तमाम फ़ालतू चीज़ें सामने आ जाती हैं ,उन्हीं को बार-बार ,देखने परखने में लीन भूल जाती हूँकि क्या ढूँढने आई थी!*...
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  April 18, 2010, 10:53 am
वन घासों के बीच झिलमिलाते इतने दीप !*इस निर्जन वन-खंडिका में संध्याकाश के नीचे कौन धर गया ?*क्रीक के दोनों ओर ,ढालों पर, निचाइयों में और हरी-भरी ऊँचाइयों पर भी . सघन श्यामलता में दीप्त होते चंचल हवा से अठखेलियाँ करते कितने -कितने दीप !*सुनहरी लौ के प्रतिबिंब तल की जल-धारा मे...
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  April 14, 2010, 10:44 am
स्वर मुझे दो ,मैं तुम्हारी प्रार्थना हूँ .*भाव में डूबे अगम्य अगाध होकर ,व्याप जाने दो हवाओं की छुअन में ,लहर में लिखती रहूँ जल वर्णमाला ,कौंध भऱ विद्युतलता के अनुरणन में कुहू घन अँधियार व्याप्त निशीथिनी में किसी संकल्पित सुकृत की पारणा हूँ *शंख की अनुगूँज का अटका हुआ स...
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  March 28, 2010, 2:58 am
एक पुरानी कविता -सपनों जैसे नयनों में झलक दिखा जाते कैसे होंगे सरिता तट, वे झाऊ के वन !*घासों के नन्हें फूल उगे होंगे तट पर ,रेतियाँ कसमसा पग तल सहलाती होंगी वन-घासों को थिरकन से भरती मंद हवा ,नन्हीं-नन्हीं पाँखुरियाँ बिखराती होगी जल का उद्दाम प्रवाह अभी वैसा ही है ,या समा...
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  March 18, 2010, 10:33 am
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